भारत की घरेलू मुद्रा रुपया या किसी भी देश की मुद्रा का कमजोर होना घरेलू और तमाम बाहरी कारकों पर निर्भर करता है । डॉलर के मुकाबले रुपए में इस वर्ष जो गिरावट देखी जा रही है उसके लिए भी कोई एक नहीं अपितु कई कारक जिम्मेदार हैं -
• अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा इस वर्ष ब्याज दरों में की गई वृद्धि ।
• पिछले कुछ समय से अमेरिका और चीन ने एक दूसरे के खिलाफ ट्रेड वार छेड़ा हुआ है । यह ट्रेड वार धीरे-धीरे करेंसी वार में बदलने लगा है ।
• अमेरिका द्वारा खुद को ईरान के साथ हुए P5+1 परमाणु समझौते से अलग करना और ईरान पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध आरोपित करना ।
• चालू खाते के घाटे की खस्ता होती स्थिति भी एक महत्वपूर्ण कारण है । चालू खाते घाटे का मतलब देश के भीतर आने वाली और देश के बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा का अंतर है ।
रुपए में गिरावट का असर :-
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में रुपए की गिरावट कुछ मोर्चों पर राहत की खबर लेकर आती है तो कुछ मोर्चे पर परेशानी पैदा करती है । हालांकि मौजूदा वित्त वर्ष में रुपए में गिरावट की दर तेज होने के कारण इससे नुकसान ज्यादा होने की संभावना है और लाभ कम ।
• भारत तेल की अपनी जरूरतों का 75% से अधिक भाग आयात करता है और आयातित तेल की मूल्य राशि का भुगतान डालर में करता है । अब क्योंकि डॉलर मजबूत हो रहा है और उसके सापेक्ष रुपए में कमजोरी आ रही है तो भारतीय तेल कंपनियों को तेल के दाम के भुगतान के रूप में अधिक रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं ।
• तेल की कीमतों में उछाल से अब मुद्रास्फीति में वृद्धि का खतरा मंडरा रहा है । अगर मुद्रास्फीति में एक सीमा से ज्यादा वृद्धि हुई तो आरबीआई नीतिगत ब्याज दरों में वृद्धि करने के लिए मजबूर होगा अगर ऐसा हुआ तो अर्थव्यवस्था में निवेश चक्र पर नकारात्मक असर पड़ेगा ।
• रुपए की गिरावट का नुकसान चालू खाते घाटे में वृद्धि के रूप में देखा जा सकता है । मौजूदा वित्त वर्ष में इसके 2.5 से 3% के स्तर तक पहुंचने की संभावना है ।
• डालर एवं अन्य प्रमुख मुद्राओं के सापेक्ष रुपए में हालिया समय में हुई तेज गिरावट के कारण भारतीयों की विदेश में पढ़ाई, पर्यटन, इलाज आदि गतिविधियां महंगी हो गई हैं ।
• विश्व बाजार में भारतीय वस्तुओं एवं सेवाओं की प्रतिस्पर्धा त्मकता बढ़ जाएगी जिससे इसकी मांग में वृद्धि होगी और अंततः निर्यात में बढ़ोतरी दर्ज होगी ।