ओजस्वी लेखक
एक राष्ट्र प्रेमी नेता होने के साथ ही लाला जी एक प्रभावशाली लेखक भी थे। मांडले जेल में रहते हुए जब उनका किसी से भी कोई संपर्क नहीं था तो उन्होंने उस समय का सदुपयोग लेखन-कार्य में किया। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण, शिवाजी, अशोक, स्वामी दयानंद व अन्यों की संक्षिप्त जीवनियां लिखीं। उन्होंने ‘नैशनल एजुकेशन’, ‘अनहैप्पी इंडिया’, ‘द स्टोरी आफ माई डिपोर्टेशन’ जैसी प्रसिद्ध रचनाएं लिखीं। ‘पंजाबी’, ‘वंदे मातरम्’ (उर्दू) व ‘द पीपुल’ नाम के तीन समाचारपत्रों की स्थापना करने और इनके माध्यम से देश में ‘स्वराज्य’ के प्रचार का गौरव इन्हें प्राप्त है। इन्होंने उर्दू दैनिक ‘वंदे मातरम्’ में लिखा : ‘मेरी जायदाद मेरी कलम है, मेरा मंदिर दिल है, मेरा मजहब मुल्क परस्ती है और मेरी उमंगें सदा जवान हैं।
योगदान
वे इटली के क्रांतिकारी ज्यूसेपे मेत्सिनी को अपना आदर्श मानते थे। वकालत करते हुए वह धीरे-धीरे कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता बने व मात्र 23 वर्ष की आयु में ‘प्रयाग सम्मेलन’ में सम्मिलित हुए। कांग्रेस के ‘लाहौर-अधिवेशन को सफल बनाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान था। पंडित लखपतराय, लाला चंदूलाल व लाला चूड़ामणि जैसे आर्य समाजी कार्यकर्ताओं के साथ मिल कर समाज के हित में किए जाने वाले कार्यक्रमों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
1887 व 1899 में देश व्यापी अकाल के पीड़ितों की सेवा में लाला जी ने स्वयं को जी-जान से झोंक दिया था। 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल-विभाजन किया तो लाला जी ने सुरेंद्रनाथ बैनर्जी और विपिन चंद्रपाल जैसे आंदोलनकारियों से हाथ मिला लिया और अंग्रेज सरकार के इस फैसले का जमकर विरोध किया। गांधी जी के असहयोग आंदोलन में ‘रोलेट एक्ट’ के विरुद्ध संघर्ष में इन्होंने ब्रिटिश सरकार की नाक में दम कर दिया था।
इसी दौरान पूरे पंजाब में इस आंदोलन को आग की भांति फैलाने में उनके द्वारा ‘लोक सेवक संघ’ की स्थापना का बहुत योगदान रहा। इसके बाद वह ‘पंजाब का शेर’ व ‘पंजाब केसरी’ के नाम से पुकारे जाने लगे।
साइमन गो बैक : 3 फरवरी 1928 को साइमन कमीशन भारत पहुंचा तो देश भर में इसका विरोध हुआ। 30 अक्तूबर 1928 को लाला जी के नेतृत्व में हाथों में काले झंडे लेकर असंख्य युवाओं ने ‘साइमन गो बैक’ के नारे लगाते हुए प्रदर्शन किया जिस दौरान अंग्रेजों द्वारा लाठीचार्ज से घायल हो गए। फिर भी वह एक वीर सेनापति की तरह डटे रहे और सहन करते रहे। शाम को एक जनसभा को संबोधित करते हुए लाला जी ने अपने अंतिम भाषण में कहा, ‘‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेज सरकार के कफन में कील साबित होगी।’’ 17 नवम्बर 1928 को यह महान आत्मा सदा के लिए हमसे बिछुड़ गई।
लाला जी जैसे देशभक्तों के बलिदान स्वरूप ही भारत आजाद हो सका। लाला जी के बलिदान के एक महीने बाद 17 दिसम्बर 1928 को महान क्रांतिकारियों चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव ने ब्रिटिश सरकार सांडर्स को गोलियों से भून कर लाला जी की मौत का बदला लिया।