इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है की सीमित अवधि में ऋण माफी का उपाय किसानों के लिए वरदान सरीखा है क्योंकि कृषि पर छाए संकट के बीच यह उन्हें ऋणदायित्वों से मुक्ति दिला देता है । लेकिन विद्वानों के बीच इस बात को लेकर मत भिन्नता पाई जाती है यह विकल्प अपनाया जाना चाहिए या नहीं ।
पक्ष में तर्क
• संकट से घिरे होने की स्थिति में कृषक ऋण नहीं चुका पाते और कर्ज के दुष्चक्र में फंस जाते हैं । ऐसे में राज्य का यह कर्तव्य है कि अपने नागरिकों को संकट से उबरने में जो कुछ भी संभव हो वह किया जाए; कृषकों के संदर्भ में ऋणमाफी उसी प्रयास के तहत जायज है ।
• कृषि में इनपुट लागत बढ़ती जा रही है जबकि निर्गत के रूप में किसान अपनी उपज का अत्यंत कम मूल्य प्राप्त कर पाते हैं जिसमें कृषि उनके लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है । इस दुष्चक्र की परिणति कृषकों की आत्महत्या के रूप में बारंबार सामने आ रही है । ऐसे में ऋण माफी के माध्यम से इस दुष्चक्र को तोड़ा जाना आवश्यक है ।
• कृषकों का माफ किया गया ऋण एक मायने में उद्योगों के सुगम आर्थिक चक्र का माध्यम ही बनता है क्योंकि किसानों की खर्च करने की शक्ति उद्योगों के लिए बाजार निर्माण करती है ।
विपक्ष में तर्क
• कृषि ऋण माफी बैंकों की बैलेंस शीट के संतुलन को बिगाड़ने का काम करेगी । पहले से संकटग्रस्त चल रहे बैंकों के लिए यह उपाय और भी संकटग्रस्त कर देने जैसा होगा ।
• ऋण माफी इमानदार ऋण संस्कृति को नुकसान पहुंचाती है और यह निर्धारित समय सीमा में अपने ऋण चुकता कर रहे लोगों को हतोत्साहित करेगी ।
• यह कदम भविष्य में किसान व बैंक के रिश्ते को कमजोर करेगा जिससे किसानों को बैंक से ऋण मिलने में परेशानी होगी ।
• सरकारों को ऋण माफी जैसी सस्ती लोकप्रियता गणित के हथकंडे को अपनाने की बजाय कृषको के लिए लाभदायक दीर्घकालिक धारणीय कदम उठाने चाहिए जो उनके जीवन को गरिमा में बनाकर उन्हें एक सफल उध्दमी के रूप में स्थापित करेगा ।