भारत का पतन

भारत के प्रति इंग्लैण्ड की अधिकार लिप्सा की भावना बहुत पहले ही उभरने लगी थी, तथा अंग्रेज़ लोग भारत को अपने अधिकार की वस्तु और सब प्रकार से पतित देश मानने लगे। भारत का उपयोग इंग्लैण्ड के लिए करना उनका प्रमुख दृष्टिकोण बन गया था। अंग्रेज़ प्रशासन, न भारतीय जनता के प्रति सहानुभूति रखता था और न ही भारतवासियों के कल्याण के प्रति सजग था। इंग्लैण्ड में जो क़ानून या नियम भारत के सम्बन्ध में बनाये जाने लगे थे, उनके प्रति यह ब्रिटिश नीति बनी कि, भारत के हितों का इंग्लैण्ड के लिए सदैव बलिदान किया जाना चाहिए। अंग्रेज़ों की इस नीति के कारण भारत उत्तरोत्तर आर्थिक दृष्टि से निर्धन और सांस्कृतिक दृष्टि से हीन होता चला गया। भारत के पतन के सम्बन्ध में कई प्रसिद्ध व्यक्तियों ने अपने विचार रखे हैं, उनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

केशव चन्द्र सेन के अनुसार - "आज हम अपने चारों ओर जो देखते हैं, वह है एक गिरा हुआ राष्ट्र। एक ऐसा राष्ट्र, जिसकी प्राचीन महानता खण्डहरों में गड़ी हुई पड़ी है। उसका राष्ट्रीय साहित्य और विज्ञान, उसका अध्यात्म ज्ञान और दर्शन, उसका उद्योग और वाणिज्य, उसकी सामाजिक समृद्धि और गार्हस्थिक सादगी और मधुरता ऐसी है, जिसकी गिनती लगभग अतीत की वस्तुओं में की जाती है। जब हम आध्यात्मिक, सामाजिक और बौद्धिक दृष्टि से उजड़े हुए, शोकयुक्त और उदासीन दृश्य, जो हमारे सामने फैला हुआ है, का निरीक्षण करते हैं, तो हम व्यर्थ ही उसमें कालिदास के देश-कविता, विज्ञान और सभ्यता के देश को पहचानने का प्रयत्न करते हैं।"
डॉ. थ्योडोर के अनुसार - "प्रधानतः आर्थिक लाभ के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने ब्रिटिश राज्य की स्थापना की और उसका विस्तार किया।"
ताराचन्द्र के अनुसार - "सत्रहवीं शताब्दी में भारत का गौरव अपनी पराकाष्ठा पर था, और उसकी मध्युगीन संस्कृति अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई थी। परन्तु जैसे-जैसे एक के बाद एक शताब्दियाँ बीतीं, वैसे-वैसे यूरोपीय सभ्यता का सूर्य तेज़ी से आकाश के मध्य की ओर बढ़ने लगा और भारतीय गगन में अन्धकार छाने लगा। फलतः जल्दी ही देश पर अन्धेरा छा गया, और नैतिक पतन तथा राजनीतिक अराजकता की परछाइयाँ लम्बी होने लगीं।[1]

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