हड़प्पा या सिन्धु सभ्यता

भारतीय पुरातत्व विभाग के जन्मदाता अलेक्जेंडर  कनिंघम थे । इसकी नींव वायसराय लार्ड कर्जन के काल में पड़ी ।

दयाराम साहनी ने  1921  ई. हड़प्पा तथा राखलदास बनर्जी ने  1922  ई.  में मोहनजोदड़ो की खोज की ।इस समय भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिर्देशक जान मार्शल थे ।

हड़प्पा सभ्यता को निम्नलिखित नाम से जाना जाता है, जैसे सभ्यता,  सिंधु सरस्वती सभ्यता,  कांस्य युगीन सभ्यता आदि ।

सिंधु सभ्यता के लोगों ने ही  पहली बार तांबा व टिन मिलाकर कांसा तैयार किया ।अतः इसे कांस्य युगीन सभ्यता कहा जाता है ।भारत में पहली बार नगरों का उदय इसी समय हुआ ।रेडियो कार्बन विधि के आधार पर सिन्धु सभ्यता का कालक्रम  2350  ई. पू . से  1750  ई. पू. निर्धारित किया गया है,  जो सर्वाधिक मान्य है ।

सर मार्टीमर व्हीलर ने सिन्धु सभ्यता का काल क्रम  2500 ई. पू .से 2500 ई. पू. ,  जबकि मार्शल ने    3250 ई . पूू  . से  1750  ई. पू . माना है ।

सिंधु सभ्यता से प्रोटो आस्ट्रेलायड, भू -मध्य सागरीय,  मंगोलायड तथा अल्पाइन प्रजातियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं ।

सिन्धु सभ्यता के उद्भव के सम्बंध में दो मत मिलते हैं -

1- विदेशी उद्भव का मत  , 2- स्वदेशी उद्भव का मत 

विदेशी उद्भव के मत को मानने वाले प्रमुख विद्वान हैं - जान मार्शल,  गार्डन चाइल्ड,  क्रेयर, डी. डी. कौशांबी तथा स्वदेशी उद्भव के मत के समर्थक अमलानंद घोष, डी. पी. अग्रवाल, एस. आर. राव आदि हैं ।

वर्तमान में भारत , पाकिस्तान, अफगानिस्तान में सिंधु सभ्यता का विस्तार मिलता है ।अफगानिस्तान में सिंधु सभ्यता के महत्वपूर्ण स्थल हैं - मुण्डीगाक और शोर्तुगई।

पाकिस्तान में मोहनजोदड़ो,  चन्हूंदड़ो, आमरी , डाबरकोट, बालाकोट ,  कोटिदीजी, अलीमुराद सिन्धु सभ्यता के प्रमुख स्थल हैैैं ।

भारत के जम्मू में मण्डा , पंजाब मेेें रोपड़ व संघोल,    हरियाणा मेेें बनावली मिताथल,   राखीगढ़ी , सिसबल, राजस्थान मेेें कालीबंगा, उ. प्र. मेेें आलमगीरपुर, गुुुुजरात मेेेंं देशलपुुर  ,  सुुरकोटदा, धौलावीरा, लोथल , रंगपुर,  रोदजी आदि स्थानो से सिंंधु सभ्यता के स्थल प्राप्त  हुए हैं ।

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