मोहनजोदड़ो से प्राप्त पशुपति शिव मुहर को जॉन मार्शल ने आद्य शिव की संज्ञा दी थी। इसमें त्रिमुखी पुरुष को एक चौकी पर पद्मासन मुद्रा में बैठे हुए दिखाया गया है। उसके सिर में सींग है तथा कलाई से कंधे तक उसकी दोनों भुजाएं चूड़ियों से युक्त हैं। उसके दाएं ओर हाथी और बाघ, बाएं ओर गैंडा का भैंसा तथा चौकी के नीचे दो हिरण उत्कीर्ण हैं।
इस मुहर में जानवरों की कुल संख्या 6 है। जबकि जानवरों के कुल प्रकार 5 हैं। इस आकृति को शिव (हिंदू धर्म) का रूप माना है। जो कि योग की मुद्रा में दर्शाया गया है। पैरों के नीचे दो मोर अंकित थे।
आरंभिक धार्मिक ग्रंथ ऋग्वेद में रुद्र नामक देवता का उल्लेख मिलता है। जो बाद में पौराणिक कथाओं में शिव के लिए प्रयुक्त नाम है। लेकिन शिव के विपरीत रूद्र को ऋग्वेद में ना तो पशुपति (मवेशी स्वामी) और ना ही एक योगी के रूप में दिखाया गया है।
यह मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक प्रसिद्ध स्मारक था। इसका निर्माण पक्की ईंटों दुर्ग क्षेत्र में किया गया था। इस के मध्य में एक स्नान कुंड था ।कुंड के पूरब दिशा में एक बड़ा कुआं बनाया गया था। विशाल स्नानागार का उपयोग सार्वजनिक रूप से धर्म अनुष्ठान संबंधी स्नान के लिए होता था।
जॉन मार्शल ने विशाल स्नानागार को विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण बताया था। यह जल पूजा का एकमात्र साक्ष्य था।