समाज सुधार से भी संभल सकता है ग्रामीण संकट

शहरों की तरफ गांवों में भी मुख्य रूप से आर्थिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की प्रवृत्ति हावी होती जा रही है। जबकि इसी के साथ हम कई अन्य उपेक्षित सामाजिक मुद्दों पर भी ध्यान दें तो ना केवल एक बेहतर समाज बना सकेंगे बल्कि कई स्तरों पर आर्थिक संकट समेत ग्रामीण इलाकों की बहुत सी समस्याओं को कम करने की दिशा में भी बढ़ सकेंगे। अनेक ऐसी सामाजिक समस्याएं हैं। जो पहले से कम होने की बजाय लगातार कहीं ज्यादा विकट होती जा रही हैं लेकिन उनकी और जरा भी ध्यान नहीं दिया जा रहा उदाहरण के लिए हम सब से पहले एक साधारण समस्या दहेज को लेते हैं। दहेज विरोधी कानून तो बहुत पहले बन गया था पर दहेज समस्या कहीं भी ना खत्म हुई और ना ही कम होगी अब तो दहेज कानून के दुरुपयोग के समाचार ही ज्यादा मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि दहेज कम हो गया लेकिन दहेज के मामले को अप समाचार लायक ही नहीं माना जाता ऐसा भी नहीं है कि कानून बनने के बाद दहेज और शादी-ब्याह पर खर्चा किसी तरह से कम हुआ हो कुछेक को छोड़ दें तो ग्रामीण समाज के अधिकांश परिवारों में दहेज व अन्य वैवाहिक तामझाम पर बेतहाशा या अपनी हैसियत से बहुत अधिक खर्च करना एक मजबूरी बना हुआ है यदि दो या तीन बेटियों का विवाह करना हो तो उस परिवार के लिए बिना बजा जिंदगी का सबसे बड़ा मुद्दा यही बन जाता है जबकि अनेक अन्य देशों में इस स्थिति में कोई कठिनाई नहीं होती है। बेटी बचाने का प्रयास दीर्घकालीन तभी सफल होगा जब दहेज की समस्या दूर होगी।

 दहेज के अतिरिक्त विवाह के अन्य खर्चों को नाहक बढ़ा चढ़ाकर कई बार वर पक्ष के लिए भी महंगा पड़ जाता है। वैसे तो यह समस्या गांव और शहर दोनों जगह है लेकिन कम आय वाले ग्रामीण परिवारों को यह सबसे ज्यादा तोड़ती है शहरों की देखा देखी ग्रामीण परिवारों में भी नए-नए तरीकों से शादी ब्याह के लिए ज्यादा से ज्यादा खर्च करने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है ।एकमुश्त अधिक खर्च की मजबूरी के कारण कई बार खेत बेचने या गिरवी रखने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। किसी जमाने में दहेज के खिलाफ जन जागृती फैलाने और सादगी से विवाह संपन्न करने की बहुत कोशिशें होती थी। लेकिन अब ऐसा कोई प्रयास नहीं दिखता सब कुछ एक ऐसे कानून के भरोसे छोड़ दिया गया है जो अपने दुरुपयोग के अलावा अक्सर कहीं और नजर नहीं आता।

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