राजनीति नहीं, समस्या के एक भागीदार हम भी हैं

जाने-माने अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने अपनी पुस्तक आइडिया आफ जस्टिस में एक अध्ययन का जिक्र किया है केरल स्वास्थ्य मानदंडों में भारत के अन्य राष्ट्र छोड़िए चीन से भी आगे और लगभग यूरोप के समकक्ष हैं। इसका कारण स्वास्थ्य और शिक्षा पर वहां की सरकारों द्वारा पिछले तमाम वर्षों में किए गए प्रयास और खर्च हैं इसके ठीक विपरीत बिहार और उत्तर प्रदेश इन स्वास्थ्य मानदंडों पर रसातल में लगातार बने हुए हैं। यह सामान्य रूप से जीवन प्रत्याशा और खासकर वृद्धावस्था की मृत्यु दर बढ़ी हुई है लेकिन जब बीमारी को लेकर व्यक्तिगत संतुष्टि का आकलन किया गया तो केरल में लोग सबसे ज्यादा असंतुष्ट पाए गए और बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग सबसे कम असंतुष्ट कारण खोजने पर सेन को पता चला कि अभाव में भी संतुष्टि का या अभाव बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों में इसलिए है कि उन्हें कभी सरकारों से अपेक्षा नहीं रही क्योंकि वे जानते भी नहीं की सरकार की भूमि का जनजीवन को उठाने में क्या और कहां तक जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए काया भाव आज भी हिंदी में भयंकर रूप से व्याप्त है। इसलिए अगर समाज की समझ ही पिछले 17 वर्षों में गाय तलाक मंदिर मस्जिद से ऊपर नहीं पढ़ पा रही है तो दोष महज राजनीतिक वर्ग का क्यों दिया जाए? अगर केरल जैसे शिक्षित और तार्किक सामूहिक सोच वाले राज्य में भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए पुरुष समाज महिलाओं को प्रवेश नहीं दे रहा है। आस्था के नाम पर राजनीतिक दलों को क्यों नहीं पक्ष और विपक्ष में खड़े होंगे यहां सवाल यह भी है कि अगर यह समझते हुए भी कि हर चुनाव के पहले आरक्षण धार्मिक प्रतीकों और जातिवाद का मुद्दा बोतल में बंद जिन की तरह बाहर निकल आता है

तो समाज की आंखों पर पर्दा क्यों पड़ा रहता है दरअसल समाज का एक तबका जिसने कुछ शिक्षित शहरी लोग ही ही नहीं राजनीतिक वर्ग भी शामिल है। जन मंच पर जैसी टीवी चैनलों पर चीख चीख कर विकास की बात करता है और इसे सिद्ध करने के लिए अपने आंकड़ों को भी पेश करता है। लेकिन वापस लौट कर बदल जाति और संप्रदाय के आधार पर टिकट दे देता है और यह कथित शहरी वर्ग अपनी जाति के नेता के घर बेटे की नौकरी लगवाने अपना तबादला रुकवाने मलाईदार करवाने के लिए पहुंच जाता है।

हम कैसा भारत आने वाली के लिए बजाने जा रहे हैं अमृत सेन ने इसका कारण बताया है उसके अनुसार, हमारे तारिक फैसले और किसी फैसले का चुनाव करते समय एक बड़ा अंतर रहता है। इसे की कमजोरी कहते हैं ग्रीक दर्शन में इसे अक्रसिया कहते है।

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