नागरिकोत्तर हड़प्पा संस्कृति के कुछ लक्षण पाकिस्तान में, मध्य व पश्चिमी भारत में तथा पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी दिखाई देते हैं।
इनका काल मोटे तौर पर 1900 से 1200 ईसा पूर्व तक हो सकता है। हड़प्पा संस्कृति की नागरिकोत्तर अवस्था को उपसिंधु संस्कृति भी कहते हैं। पहले इस संस्कृति को हड़पोत्तर बतलाया जाता था, पर अब यह उत्तर-हड़प्पा संस्कृति के नाम से अधिक जाना जाता है।
उत्तर हड़प्पा संस्कृति या मूलतः ताम्र पाषाणिक हैं जिनमें पत्थर व तांबे के औजारों का उपयोग होता था। इनमें धातु के ऐसे ही उपकरण बनते थे जिनकी ढलाई आसान हो।
स्वात घाटी को उत्तर हड़प्पा संस्कृति का उत्तरी छोर मान सकते हैं।
अलमगीरपुर में उत्तर हड़प्पा लोग संभवत कपास की उपजाते थे जैसा कि हड़प्पा के मृदभांडों पर मिले कपड़े की छापो से अनुमान लगाया जा सकता है।
उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों के उत्तर हड़प्पा स्थलों में जो चित्रित हड़प्पाई मृदभांड पाए गए हैं। उनमें आकृतियां अपेक्षाकृत सरल हो गई हैं। हालांकि कुछ नए पात्र-प्रकार भी मिले हैं। कुछ उत्तर हड़प्पा पात्र प्रकार भगवानपुरा के चित्र धूसर मृदभांड या पेंटेड ग्रे वेयर अवशेषों से समिश्रित पाए गए हैं। उत्तर हड़प्पा अवस्था में लंबाई मापने की कोई वस्तु नहीं पाई गई हैं। आमतौर से सभी उत्तर हड़प्पा स्थलों में मानव मूर्तिकाओं और वैशिष्ट्य सूचक चित्राकृतियों का अभाव है ।
मृदभांड
मृदभांड अधिकांशत लाल व गुलाबी रंग के थे ।इन पर अलंकरण काले रंग से हुआ था। मृदभांडों पर हड़प्पा लिपि मिलती है।
लोथल से प्राप्त मृदभांड में एक वृक्ष मेंं मुंह में मछली पकड़े हुए एक चिड़िया को दर्शाया गया है तथा नीचे एक लोमड़ी का चित्र है। यह पंचतंत्र की प्रसिद्ध कथा ‛चालाक लोमड़ी’ को दर्शाता है।