कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों के अर्थ
वयन:- कलाकृतियों में प्रयोग की जाने वाली सामाग्री से जो प्रभाव उत्पन्न होता है उसे वयन कहा जाता है। इसकी रचना के तीन श्रोत माने गये है प्राप्त अनुकृत एवं मौलिक।
छाया प्रकाश:- रंगों के हल्के-गहरे बलों/मानों अथवा श्वेत-काले के प्रयोग से आकृतियों के प्रकाशित एवं अधेरे वाले भाग के चित्रण को छाया-प्रकाश कहा जाता है।
त्रि-आयामी कलाएँ:- ऐसी कलायें जिसमें मूर्ति एवं भवन की त्रि-आयामी रचना की जाती है,त्रिआयामी कहा जाता है।
भू-दृश्य/सैरा चित्र:- दृश्य चित्रण का वहा भाग जिसमें भूमि के प्राकृतिक दृश्य को चित्र के अधिकांश भाग में आवश्यक रूप से चित्रित किया गया है।
कला दीर्घा/कला वीथी:- ऐसा स्थान जहाँ कलाकृतियाँ सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित की जाती है, कलावीथी कहलाती है।
तंजोवलय:- देवी,देवताओं या संतों के शीर्षों के पीछे चित्रित प्रकाशमान वृत्ताकार या दीर्घवृत्ताकार प्रभामण्डल तेजोवलय कहलाती है।
वंधक:- तेल,सरेस,गोंद,राल के समान द्रव पदार्थ जो रंगचूर्ण को द्रवरूप में बांध लेते है, बंधक कहलाते है।
भंजित रंग:- रंग के चमकीलापन या स्वाभाविक तेज घटाने के लिए किसी अन्य रंगों के मिश्रण से निर्मित रंग को भंजिल रंग (ब्रोकेन कलर) कहा जाता है।
गैसो:- श्वेत मिश्रित जलरंग चित्रण को गैसो कहा जाता है। इसे अपारदर्शी जलरंग पद्धति के नाम से भी जाना जाता है।
ब्वान फ्रेस्को:- गीले पलस्तर पर किये जाने वाले भित्ति चित्रण को ब्वान फ्रेस्को के नाम से भी जाना जाता है।
क्षितिज रेखा:- चित्र की सभी आकृतियों की रेखायें यदि बढ़ा दी जाये तो वे क्षितिज रेखा पर जाकर मिल जाती है, जिसे दृष्टि-तल या क्षितिज रेखा कहते है।