धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिरपेक्ष राज्य का चरित्र यह है कि धर्म समाज का सामूहिक कार्य न होकर व्यक्ति का व्यक्तिगत कार्य है। प्राचीन और मध्य युग मे धर्म को सामान्यतया समाज का सामूहिक कार्य माना जाता था। वस्तुतः धार्मिक जीवन के दो अंग विश्वास और आडम्बर होते है, इनमे विश्वास ही अधिक महत्वपूर्ण होता है । धर्म आंतरिक विश्वास की वस्तु है।धर्मनिरपेक्ष राज्य , धार्मिक उदारतावाद का प्रशंसक और धार्मिक कट्टरता का विरोधी होता है। दूसरी ओर धर्म सापेक्ष राज्य का अपना विशेष धर्म होता है। लेकिन धर्मनिरपेक्ष राज्य सभी धर्मों को समान समझता है और इसके द्वारा क़िसी विशेष धर्म को बढ़ाने का या कम करने का कोई प्रयत्न नही किया जाता। धार्मिक स्वतंत्रता के साथ धर्मनिरपेक्ष राज्य सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य के अंतर्गत कोई भी धर्म या उस धर्म से संबंधित पुरोहित वर्ग उस राज्य के कानूनों से मुक्त नही होता। ऐसे राज्य में सभी नागरिकों को अपनी इच्छानुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करने का तो अधिकार होता है, किन्तु उन्हें अन्य धर्मों का विरोध करने का अधिकार नही होता। नागरिको से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कोई भी ऐसा काम न करे जिससे अन्य धर्मों के अनुयायियों की धार्मिक भावनाओं को आघात पहुँचे।
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