लोकतंत्र केवल राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति ही नही, बल्कि शासन और जीवन की लोकजयी धारणा भी है। लोकतंत्रात्मक व्यवस्था, व्यष्टिवाद से समष्टिवाद की ओर अग्रसर होती है, इसलिए लोकतंत्र में व्यक्ति का महत्व अधिक है। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र को आरोही क्रम में इस प्रकार देखा जा सकता है - व्यक्ति , परिवार ,समाज ,प्रदेश, और अंततः राष्ट्र। वह एकमात्र शासन चलाने की व्यवस्था नही है, वह तो एक विकासशील दर्शन है और जीने की एक गतिशील पद्यति भी। लोकतंत्र जनता द्वारा जनता का शासन है अर्थात जिस व्यवस्था की चर्चा हो रही है, उसमे जीने वाले व्यक्ति स्वयं पर शासन चलाते है । चूंकि शासन को सामूहिक रूप देना होता है अतः जनता अपनी पसंद के प्रतिनिधि को चुनती है और एक निश्चित अवधि के लिए शासक बना देती है। लोकतंत्र मूलतः एक नैतिक व्यवस्था है जिसमे निर्णय का खुलापन है। वह जनता को बिना किसी रक्तपात के शासक वर्ग को सत्ताच्युत व सत्तासीन करने का अधिकार देता है। हमारे लोकतंत्र का भविष्य बहुत हद तक जनता और नेता की महत्वाकांक्ष के साथ जुड़ा है।