पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति को जिस वजह से सबसे ज्यादा नकारात्मकता का शिकार होना पड़ा है, वह है राजनीति का अपराधीकरण। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में राजनीति और अपराध इतने घुल मिल गए है कि इनके बीच स्पष्ट विभाजक रेखा खींचना कठिन हो गया है। स्थिति तो यह हो गयी है कि आज बहुत से लोग राजनीति में प्रवेश करने से हिचकिचाने लगे है। चुनाव आयोग की तमाम शक्ति और सूचना के अधिकार कानून से मिल रही जानकारी के बावजूद इस दिशा में लगाम लगाना मुश्किल हो रहा है। हालांकि आपराधिक मामलों में दोषी ठहराया जाने के बावजूद चुनाव लड़ने की पाबंदी के चलते राजनीति में अपराधी तत्वों के प्रवेश में कमी की उम्मीद की जा रही है लेकिन सवाल यही है कि जितना मुश्किल राजनीति से अपराध को दूर रखना है, किसी व्यक्ति को किसी अपराध में दोषी ठहराना उससे भी मुश्किल है।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद प्रथम तीन आम चुनावों तक तो ऐसा प्रतीत होता था कि भारत मे स्वस्थ लोकतंत्र की स्थापना हो गयी है और वह इस देश मे गहरी जड़े पकड़ता जा रहा है, परंतु 1967 के बाद के निर्वाचनों में उक्त धारणा का खंडन ही नही हुआ है बल्कि भारतीय राजनीति में नैतिक एवं चारित्रिक पतन की जड़ें पकड़ता जा रहा है।