सीबीआई की साख

कहा जाता है कि कीचड़ की होली एक बार जरूर होती है तो अंत में हर किसी का दामन मेला होता है जो इस खेल में शामिल होते हैं और जो नहीं होते हैं कोई भी बेदाग नहीं बसता बाद में या बताना मुश्किल हो जाता है ।कि कौन इस खेल में शरीक था और कौन महज दर्शक कौन कीचड़ उछाल रहा था और कौन उससे खुद को बचा रहा था केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई इन दिनों ऐसी ही होली खेल रही है जिस खेल को अभी कुछ ही दिन पहले तक सीबीआई बनाम सीबीआई कहा जा रहा था उसके छींटे अब देश की कई दूसरी संस्थाओं कई बड़े पदाधिकारियों और राजनेताओं पर उछलने लगे हैं। सच क्या है या बताना तो खैर असंभव सा ही है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि देश की सर्वोच्च खुफिया एजेंसी की साख और विश्वसनीयता रसातल से भी कहीं नीचे पहुंच चुकी है सीबीआई के प्रमुख सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को अपना जवाब सोते हैं और इससे पहले कि अगले दिन अदालत सुनवाई के लिए बैठे सीलबंद चिट्ठी लीक हो जाती है कोई और मामला होता तो शीर्ष अदालत इस पूरी घटना की जांच का काम सीबीआई को सौंप देती पूरा मामला ही सीबीआई का है तो जांच कौन करेगा पूरे घटनाक्रम से नाराज सर्वोच्च अदालत के जजों ने लगातार चालक प्रिया की है लेकिन इन सबसे किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगी इसकी कोई गारंटी नहीं है ऐसी ही एक तल्ख टिप्पणी शीर्ष अदालत ने कई साल पहले की थी।

जब उसने इस संस्था को पिंजरे में बंद तोता कहा था उम्मीद बनी थी की चीजें बदलेंगे लेकिन हकीकत में कुछ नहीं बदला तब या लगता था कि सीबीआई अपनी साख को सुधारने के लिए कुछ करेगी लेकिन साथ इस हद तक गिर गई की संस्था के निदेशक और विशेष निदेशक की आपस में उलझ गए यादव आला अफसरों का पेशेवर उलझा ऊपर नहीं था। बल्कि एक ऐसी लड़ाई सामने आई जहां दोनों एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा रहे थे। इसके साथ ही इस खुफिया संस्था के कुछ छोटे बड़े अन्य मोर्चे भी खुल गए हैं। जिन्होंने कुछ राजनीतिज्ञों समेत देश के सुरक्षा सलाहकार जैसे महत्वपूर्ण पदाधिकारी को भी नहीं बख्शा यह सभी चीजें जितनी सुप्रीम कोर्ट को परेशान कर रही हैं उससे कहीं ज्यादा देश के नागरिकों को चिकन दे रही हैं लोकतंत्र में हम जिन संस्थाओं के भरोसे रहते हैं अगर वे अविश्वसनीय और यहां तक की हास्यास्पद हो जाए तो इसका जनमानस पर पड़ने वाला असर खासा बुरा होता है।

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