बार बार कहा जाता है कि यह भारत के सतर्क होने का समय है लेकिन हमने तो जैसे सतर्क होना ही छोड़ दिया है। यही कारण है कि दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 14 भारत के हैं और इनमें भी सर्वाधिक खतरे वाला इलाका दिल्ली एनसीआर क्षेत्र है यह भी तथ्य है कि भारत में हर साल महज प्रदूषण से लाखों महोदय होती हैं और यह भी कि दिल्ली का प्रदूषण इस बार अभी से तमाम मांगों के पार पहुंच गया है ।हास्यास्पद कहे याद चिंताजनक की महज करवा चौथ की थोड़ी सी आतिशबाजी ने दिल्ली के दोहे में इतना इजाफा किया कि दिल्ली हां अपने लगी लेकिन पटाखों पर प्रतिबंध के नाम से बेचैन भी दिख रही है दरअसल प्रदूषण हमारे लिए अन्य तमाम मौसम की तरह दूसरों की तरह एक और दूसरी बनकर रह गया है जिसकी चिंता भी हम बाकी दूसरों की तरह नहीं करते हैं यह भारत में ही हो सकता है। जहां की व्यवस्थाएं इतनी गंभीर चेतावनी के बाद भी नाचे दे जहरीली हवाओं से होने वाली मौतों के आंकड़ों में सबसे आगे निकल जाने की चेतावनी दे दी अक्टूबर 2017 की रिपोर्ट अभी अभी सामने आई स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का यह बड़े खतरे का इशारा कर रही है।
सवाल है कि तमाम खतरों चेतावनी ओं के बावजूद हमने उनसे निपटने की दीर्घकालीन रणनीति क्यों नहीं बनाई वैसे रणनीति जो 90 के दशक में दिल्ली ने सोची तो जरूर लेकिन उसे दीर्घकालिक रूप ना दे सकी। दिल्ली ऐसे भयावह प्रदूषण संकट से गुजर रही थी जब 1993 में सीएनजी ने इसकी सांसो को बड़ी राहत दी लेकिन इसके सुखद नतीजे देख दिल्ली हाथ पर हाथ धरे बैठे गई और बहुत जल्द ही समस्या फिर वही पहुंच गई जहां इसे विराम देने की कोशिश हुई थी हमने समाधान तो निकाला है। लेकिन हम दूरगामी सोच नहीं विकसित कर पाए जबकि आबादी और वाहनों की रफ्तार तो देखते हुए याद बहुत जरूरी था।