श्रीलंका की असमंजस भरी राह

श्रीलंका में राजनीतिक संकट गहराने के साथी विश्व में तमाम देशों की नजरे ना सिर्फ कोलंबो पर बल की नई दिल्ली पर भी टिक गई है और उसी देशों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खासा संजीदा रहे हैं। इसलिए भारत से कुछ ज्यादा उम्मीदें हैं कि उसने जिस तरह मालदीव में तानाशाही व्यवस्था की राहों की थी। कुछ ऐसी ही सफलता व श्रीलंका में भी दौर आएगा इसलिए हफ्ते मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मामून अब्दुल कयूम ने भी माना था कि भारत लोकतंत्र की बहाली के लिए दबाव डालने में सक्षम है। हालांकि श्रीलंका मालदीव नहीं है और पिछले दो हफ्तों का संकेत यही है कि नई दिल्ली लोकतंत्र कायम रखने के मामले में अपने सिद्धांत को प्राथमिकता दे रहा है और वेट एंड वॉच यानी देखो और इंतजार करो की स्थिति में श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट का फैसला और फिर भी वहां की संसद में जो कुछ हुआ वह राष्ट्रपति मैथ्रिपाला सिरीसेना के लिए एक झटका और अतिरिक्त संविधान एक माध्यमों का इस्तेमाल करके महिंदा राजपक्षे द्वारा सत्ता हथियाने एक प्रयास ही माना जाएगा। ताजा घटनाक्रम एक तरह से एशिया के इस पुराने लोकतांत्रिक देश में कानून के शासन की नीतिगत जीत जरूर है मगर या मौजूदा राजनीतिक संकट की जड़ से खत्म करने में सक्षम नहीं होगा वहां स्थिरता तब तक जारी रहेगी जब तक आम चुनाव नहीं हो जाते हैं। संभव है कि बर्खास्त कर दिए गए प्रधानमंत्री रानिल विक्रमासिंघे कानूनी और संसदीय जंग जीत जाएं। श्रीलंका की सड़कों पर अभी भावना वाले भव्य गठबंधन की वापसी की बयार बह रही है। उम्मीद है कि भारत संयम की अपनी मुद्रा बरकरार रखेगा लेकिन दो आकलन बताते हैं कि नहीं दिल्ली को राजपक्षे की संभावित वापसी के लिए भी तैयार रहना होगा।

फैसला किया है कि 2015 में अस्तित्व में आए श्री सेना विक्रम सिंह के स्वाभाविक गठबंधन का स्वाभाविक अंत 2 हफ्ते पहले श्री सेना के वफादार ओं की पराजय से पहले ही हो गया था। एक दूसरे को कमजोर करने की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की लगातार कोशिशों शे सरकार पक्षाघात का शिकार हो गई थी। जिसका दुष्प्रभाव भारत के साथ द्विपक्षीय रिश्ते पर भी पड़ा। इस साल की शुरुआत में स्थानीय चुनावों में राजपक्षे की व्यापक जीत और शिवसेना के साथ उनके एक नए गठबंधन को ध्यान में रखें तो या प्रयास गलत नहीं है कि उनकी संयुक्त ताकत आज नहीं तो कल सत्ता पर जरूर काबिज होगी।

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