पिछले कुछ महीनों में भारत में आर्थिक अखबार विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा की गई कृषि कर्ज माफी की घोषणाओं के खिलाफ बरस पड़े हैं। शुरुआत उत्तर प्रदेश में किसानों की कर्ज माफी से हुई उसके बाद पूरे देश में किसानों के आंदोलन और उनकी आत्महत्या ओं की खबरों के बाद कई राज्य सरकारें संकट में कमी लाने के गंभीर विकल्प के रूप में इस पर विचार करने के लिए भाबी हुई हैं।
मीडिया और अन्य टिप्पणी कार किसानों के संकट की वास्तविकता को तो कबूल करते हैं और समस्या समाधान के उपाय के रूप में कृषि कर्ज माफी पर गंभीर आपत्तियां खड़ी करने लगते हैं आलोचना को सारांश में हम रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल इन शब्दों से समझ सकते हैं। मैं सोचता हूं कि आप ईमानदार संस्कृति को कमजोर करती है और अनुशासन को प्रभावित करती है या भविष्य में ऋण लेने वालों द्वारा ऋण चुकाने की पहल को कुंद कर दी है। दूसरे शब्दों में ऋण माफी से नैतिक जोखिम पैदा होता है इस संदर्भ में कर्ज माफी पर विचार किया जा रहा है उस संदर्भ में इन दावों की गंभीर जांच की जहमत कोई नहीं उठा रहा कृषि कर्ज माफी का यह पहला मौका नहीं है। इनके प्रभाव का अनुभव के आधार पर आकलन संभव है या जा सकता है कि कर्ज माफी नहीं दी जाती है उनके संभावित परिणाम क्या होंगे अभी सोचना होगा कि लोकलुभावन राजनीति का लक्षण है।
भारत में मौजूद कहीं अधिक बुनियादी समस्या का संकेत है मामला 2010 का था जब देश में 35 वर्ष का सबसे भयंकर सूखा पड़ा था तब से 8 वर्ष बीत गए। लेकिन ऐसा कोई नहीं मिला कि में किसी तरह की आई है कर्ज माफी की बार बार मांग की जा रही है 2016 लगातार 2 वर्षों तक पड़े सूखे के दौरान भी नहीं अतीत की हर कर्ज माफी का सच यही है या कहीं ना कहीं लगता है कि इससे कर संस्कृति को गंभीर नुकसान होता है क्या इससे नैतिक जोखिम की अवधारणा गलत साबित हो जाती है। ऐसी कर्जमाफी रूप से किसानों को सरकार द्वारा एक वर्ग के रूप में किसानों को दी जाती है इसलिए अगर कोई किसान इस आशा में अपना नहीं करता है। कर्ज माफ कर दिया जाएगा तो वह बहुत बड़ी चुक रहा है।