भारत में पाषाणिक सभ्यताओं की खोज की शुरुआत 1863 से होती है, जबकि भारतीय भूतत्व सर्वेक्षण के विशन रॉबर्ट ब्रूस फुट को पल्लवरम (तमिलनाडु) से एक पाषाणोपकरण मिला । अब तक उत्तर प्रदेश सहित भारत के कई राज्यों में पाषाणिक संस्कृति के अवशेष मिल चुके हैं। पाषाणिक संस्कृति को तीन भागों में बांटा गया है यथा-- पूरा, मध्य तथा नवपाषाण काल।
- उत्तर प्रदेश में पूरा पाषाण कालीन सभ्यता के साक्ष्य इलाहाबाद (अब प्रयागराज) की घाटी सोनभद्र की सिंगरौली घाटी तथा चंदौली के चकिया नामक पूरास्थलों से प्राप्त हुए हैं। बेलन नदी घाटी के पूरास्थलों की खोज और खुदाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जी आर शर्मा के निर्देशन में कराया गया. बेलन घाटी के लोहदा नाला क्षेत्र नामक स्थल से पाषाण उपकरणों के साथ साथ एक अस्थि निर्मित मातृ देवी की प्रतिमा भी मिली है। इस सभ्यता के प्रायः सभी उपकरण क्वार्टजाइट पत्थरों से निर्मित है। इन स्थलों के साक्ष्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इन्हें आग कृषि कार्य गृह निर्माण आदि का ज्ञान नहीं था, जबकि कुछ मात्रा में पशुपालन से परिचित होने के साक्ष्य मिलते हैं।
- राज्य में मध्य पाषाण कालीन संस्कृति के साक्ष्य से मिर्जापुर - सोनभद्र की मोरहना पहाड़, बघरीखोर, लेखहिया आदि स्थलों इलाहाबाद की मेजा, करछना फूलपुर, कोरांव, बारा तहसील में स्थित पुरा स्थलों, प्रतापगढ़ के सरायनाहर महदाह दमदमा आदि पूरास्थानों से प्राप्त हुए हैं।