इसरो के 'मानव अंतरिक्ष उड़ान' की कमान इस महिला के हाथ

इस बार एक महिला वैज्ञानिक को इसरो के अत्याधुनिक प्रोग्राम मानव अंतरिक्ष उड़ान परियोजना के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है.

ये महिला हैं डॉक्टर ललिताम्बिका वी.आर. जो एक ऐसे प्रोजेक्ट की ज़िम्मेदारी संभालेंगी जिसने क्रू एस्केप सिस्टम (क्रू के सदस्यों का सुरक्षित निकलना) के लिए पिछले महीने सफलतापूर्वक एक प्रमुख तकनीक का प्रदर्शन किया था और ये तकनीक मानवीय अंतरिक्ष उड़ान के लिए ज़रूरी है.

डॉक्टर ललिताम्बिका को ये पद इसरो में ज़िम्मेदारियों के पुनर्गठन के बाद दिया गया है.

पहला 'पैड अबॉर्ट' टेस्ट श्रीहरिकोटा लॉन्च पैड पर किया गया था. जिसमें यह दिखाया गया है कि स्पेस फ्लाइट को रद्द करने पर कैसे क्रू के सदस्य वहां से निकल सकते हैं.

इसरो ने कहा था कि टेस्ट फ्लाइट के दौरान 300 सेंसर्स ने अभियान की अलग-अलग तरह की गतिविधियां रिकॉर्ड कीं.

104 सैटेलाइट का रिकॉर्ड

डॉक्टर ललिताम्बिका के पास न सिर्फ़ तकनीकी बल्कि प्रबंधकीय अनुभव भी है.

 दूसरी महिला वैज्ञानिक डॉक्टर अनुराधा टीके हैं जो इसरो के सैटेलाइट कम्युनिकेशन प्रोग्राम का नेतृत्व करने जा रही हैं.

डॉक्टर ललिताम्बिका विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर की उप निदेशक के तौर पर काम कर चुकी हैं.

इस पद रहते हुए उन्होंने 104 सैटेलाइट लॉन्च करने वाली टीम का नेतृत्व किया था और इस उपलब्धि को दुनियाभर में सराहना मिली थी. इससे पहले रूस का 37 सैटेलाइट लॉन्च करने का रिकॉर्ड रहा है.

इस भारतीय परियोजना की सफलता का आकलन इस तथ्य से किया जा सकता है कि कोई भी उपग्रह एक-दूसरे के साथ नहीं टकराया था.

मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम को मंज़ूरी मिलने के बाद, यह कार्यालय नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करेगा क्योंकि इसे अन्य सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय करना होगा.''

इसरो मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के लिए भारतीय वायु सेना (आईएएफ), डीआरडीओ और अन्य एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करेगा.

राकेश शर्मा आईएएफ के ही पायलट थे जिन्होंने 1984 में सोवियत रूस मिशन पर अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय होने का गौरव प्राप्त किया था.

मानव अंतरिक्ष उड़ान अभियान को कुछ समय लगेगा क्योंकि भारत का ध्यान देश के आर्थिक विकास के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने पर अधिक रहा है, जैसी कि अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक डॉक्टर विक्रम साराभाई की परिकल्पना थी.

इस साल विक्रम साराभाई की 100वीं जयंती भी मनाई जा रही है.

शैक्षणिक, संचार, रिमोट सेंसिंग आदि के लिए उपग्रहों को प्रक्षेपित करने पर भारत का ध्यान रहा है जो अब एक नया मोड़ लेने वाला है. जिओ सिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) पर बड़े उपग्रहों को लॉन्च करने पर ध्यान केंद्रित करने के साथ वर्कहॉर्स पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही है.

लेकिन, 2019 के मध्य में एक लघु उपग्रह प्रक्षेपण वाहन का प्रदर्शन भी करने जा रहा है.

डॉक्टर शिवन कहते हैं, ''छोटे उपग्रह को बड़े प्रक्षेपण वाहन से प्रक्षेपित करना लागत के हिसाब से ठीक नहीं है. निजी क्षेत्र तुरंत उपग्रह प्रक्षेपित करना पसंद करेगा. इसलिए, एसएसएलवी की क्षमता बेहतर है क्योंकि इसे बनाने के लिए पीएसएलवी की लागत का सिर्फ़ दसवां हिस्सा खर्च होगा. इस तरह इसरो प्रक्षेपण वाहनों को लेकर और भी नए विकल्प तलाश रहा है.''

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