महात्मा गांधी के नैतिक अर्थव्यवस्था के संबंध में विचार ।

महात्मा गांधी ने अपनी सर्वोदय सिद्धांत में अर्थव्यवस्था को भी नैतिक आधार देने की वकालत की है । उन्होंने कहा है कि धर्म विहीन अर्थव्यवस्था मृत देह के सामान है । यहां धर्म का अर्थ नैतिकता से है । नैतिक अर्थव्यवस्था की पहली शर्त है अपरिग्रह का मूल्य व्यक्ति को अपनी आवश्यकताएं अत्यंत निम्न रखनी चाहिए । उन्होंने पूंजीवाद को शैतानी सभ्यता कहा है क्योंकि वह अधिक से अधिक मांग बढ़ाने पर बल देती है ।
         अन्नदायी श्रम की धारणा भी महत्वपूर्ण है । इसका अर्थ है कि ईमानदारी से परिश्रम किए बिना व्यक्ति को भोजन करने का नैतिक अधिकार नहीं है । गांधी जी ने प्रसिद्ध ईसाई संत पाॅल का एक कथन उद्धृत किया है- "जो काम नहीं करता उसे खाना भी नहीं खाना चाहिए।" उनका विचार है कि यदि संसार में एक भी व्यक्ति आलसी रहेगा तो कोई ना कोई भूख से जरूर मरेगा ।
         ‎गांधी जी का दावा है कि विभिन्न श्रमों का मूल्य समान होता है । बौद्धिक श्रम और शारीरिक श्रम को बराबर आॅकना चाहिए नाई और वकील की आय बराबर होनी चाहिए क्योंकि दोनों की मानवीय आवश्यकताएं बराबर हैं । वह पूंजीवाद के सिद्धांत के खिलाफ है कि व्यक्ति के श्रम का मूल्य बाजार तय करेगा । जॉन रस्किन का यह सिद्धांत उन्हें प्रिय है कि "श्रम का मूल्य मांग व आपूर्ति के यांत्रिक सिद्धांत के आधार पर नहीं बल्कि न्याय के आधार पर तय होना चाहिए।"
         ‎ गांधीजी एक ऐसी अवस्था चाहते हैं जो सभी की जरूरतों का ध्यान रखें । पूंजीवाद कमजोरों का ध्यान नहीं रखता । उपयोगितावाद भी सिर्फ अधिकतम व्यक्तियों पर बल देता है । गांधीजी की चिंता उस आखिरी आदमी की है  जो इन व्यवस्थाओं में पीस जाता है ।उनका कथन है, "तुमने जो सबसे गरीब और सबसे कमजोर आदमी देखा हो उसका ध्यान करो और फिर अपने दिल से पूछो कि तुम जो कदम उठाना चाहते हो क्या इससे उस आदमी को कोई फायदा होगा ?" यह विचार सर्वोदय अर्थात सभी का उदय तथा अंत्योदय जैसे कार्यक्रमों का आधार बना ।
         ‎ गांधी जी ने समाजवाद का समर्थन किया है किंतु हिंसा पर आधारित मार्क्सवाद का नहीं । वे मानते हैं कि आर्थिक संसाधन व्यक्ति कि नहीं समाज के होते हैं । उन्होंने भारतीय वेदांत परंपरा को समाजवाद से जोड़ दिया (जैसे विवेकानंद ने भी जोड़ा है)। उनका कथन है, "सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ है जो हमें यह सिखा गए हैं, कि सबै भूमि गोपाल की'; इसमें मेरी तेरी की सीमाएं नहीं है । ये सीमाएं मंच द्वारा निर्मित है और वे उन्हें तोड़ भी सकते हैं ।"

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