सामान्यतया समास को पहचानने में कुछ दिक्कतें आती हैं जिसे हम समास निर्णय की समस्या कहते हैं । आइए इसके बारे में कुछ संक्षिप्त जानकारी लेते हैं ।

जब परीक्षक 'शब्द' देते हैं और उसमें समास को चिन्हित करने के लिए परीक्षार्थी से कहते हैं, तब परीक्षार्थी के लिए समास- निर्णय की समस्या उठ खड़ी होती है । कारण यह है कि समास विशेष का निर्णय विग्रह से होता है । परिणामत: परीक्षार्थी शब्द का कोई भी विग्रह करने के लिए स्वतंत्र होता है । इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है -विद्याधन । विद्याधन का छ: तरह से विग्रह किया जा सकता है  - विद्या से 'के द्वारा' अर्जित धन (तृतीय तत्पुरुष), विद्या के लिए धन (चतुर्थी तत्पुरुष), विद्या का धन (षष्ठी तत्पुरुष), विद्या रूपी धन (कर्मधारय), विद्या और धन (द्वन्द्व),  विद्या है धन जिसका वह, सरस्वती (बाहुव्रीह) ।

       यदि परीक्षक प्रश्न में स्वतंत्र 'शब्द' की जगह वाक्य में प्रयुक्त शब्द यानी 'पद' में समास बताने को कहे तो यह समस्या नहीं उठेगी, क्योंकि वाक्य में प्रयुक्त होने पर 'शब्द' सीमित होकर 'पद' बन जाएगा और 'पद' का एक ही विग्रह होगा यानी द्विविधा की स्थिति नहीं रहेगी; जैसे वसंत पंचमी के दिन विद्याधन की पूजा की जाती है (विद्या है धन जिसका, अर्थात सरस्वती बहुव्रीहि समास) ।
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• विद्याधर शर्मा की समृद्धि का राज विद्याधन ही है (विद्या से अर्जित धन- तत्पुरुष) । विद्याधन (विद्यारूपी धन - कर्मधारय समास) की चाह रखने वाले को विद्याधन (विद्या है धन जिसका, अर्थात सरस्वती- बहुव्रीहि समास) की पूजा करनी चाहिए ।
• ‎मैंने एक पीताम्बर खरीदा (पीला वस्त्र- कर्मधारय समास) । मैंने पितांबर की पूजा की (पीत है अंबर जिसका, अर्थात विष्णु - बहुव्रीहि समास) ।

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