महायज्ञ ( बड़े यज्ञ )

राजकुल के व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले यज्ञ को महायज्ञ की श्रेणी में रखा जाता था। महायज्ञ के संपादन में 17 पुरोहितों की आवश्यकता होती थी। इसके निम्न प्रकार हैं -

   राजसूय यज्ञ या राज्याभिषेक यज्ञ-

इसका शाब्दिक अर्थ राजकीय संस्कार है। यह राजा के सिंहासनारोहण से संबंधित यज्ञ था। इस यज्ञ के अवसर पर राजा राजकीय वस्त्रों से सुसज्जित होकर पुरोहित से धनुष बाण लेकर स्वयं को राजा घोषित करता था। हालांकि यह सिंहासनारोहण से संबंधित यज्ञ था। यह 1 वर्ष तक चलता था।बाद के दिनों में इसे सामान्य अभिषेक तक सीमित कर दिया गया था।

राजसूय यज्ञ-

इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऐतरेय ब्राह्मण में मिलता है। राजसूय यज्ञ कराने वाले पुरोहित को 24000 गाय तक दान में दिए जाते थे।

वाजपेय यज्ञ- 

बाजपेय का शाब्दिक अर्थ शक्ति का पान है। यह शौर्य प्रदर्शन व प्रजा के मनोरंजनार्थ किया जाने वाला यज्ञ था। यह 17 दिनों तक चलता था।

अश्वमेघ यज्ञ- 

अश्वमेघ का शाब्दिक अर्थ घोड़े की बलि है। यह राजनीतिक विस्तार हेतु किया जाने वाला यज्ञ था। इस यज्ञ में एक घोड़ा को अभिषेक के पश्चात 1 वर्ष के लिए स्वतंत्र विचरण के लिए छोड़ दिया जाता था। विचरण करने वाले संपूर्ण भाग पर राजा का आधिपत्य समझ लिया जाता था। चुने हुए 400 योद्धा मार्ग में उस घोड़े की रक्षा करते थे। यदि कोई राजा उसे पकड़ ले तो उस राजा से युद्ध किया जा सके वर्ष समाप्त होने के साथ ही उस घोड़े को राजधानी लाया जाता था और उसकी बलि दी जाती थी। और समझा जाता था कि अश्वमेघ अनुष्ठान से विजय और संप्रभुता की प्राप्ति होती है। यह यज्ञ 3 दिनों तक चलता था।

विशेष:       यह यज्ञ महात्मा बुद्ध की तीव्र भर्त्सना के कारण कुछ समय तक बंद रहा पुनः पुष्यमित्र शुंग द्वारा इस परंपरा को आरंभ किया गया। इस यज्ञ का प्रचलन गुप्त एवं प्रारंभिक चालुक्य वंश तक रहा उसके बाद यह बंद हो गया।

अग्निष्टोम यज्ञ- 

यह देवताओं को प्रसन्न करने हेतु अग्नि को पशु बलि दिया जाने वाला यज्ञ था। यह यज्ञ एक दिन चलता था। इस 1 दिन के यज्ञ में सुबह दोपहर व शाम को सोमरस पिया जाता था। इस यज्ञ के पूर्व याज्ञक और उसकी पत्नी को 1 वर्ष तक सात्विक जीवन व्यतीत करना पड़ता था।

सोमरस:       यह एक ऐसा पौधा था। जो कि हिमालय की एक चोटी मूजवन्त से प्राप्त होता था। जिससे यह रस निकाला जाता था। बली दिए जाने के समय सोमरस का पान किया जाता था। इसका उल्लेख ऋग्वेद के नौवें मंडल में मिलता है।

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