ब्रम्हा समाज (1828)

अगस्त, 1828 में राजा राम मोहन राय ने ब्रम्ह सभा का गठन किया, जिसे बाद में नाम परिवर्तित कर 'ब्रम्हा समाज' कहा जाने लगा। ब्रम्ह समाज के अनुसार , ईशवर एक है और सभी सद्गुणों का केंद्र व भंडार है। परंतु परमात्मा निर्गुण एवं निराकार है। वह न कभी जन्म लेता है न कभी मरता है।वह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान ,सृस्टि का पालनकर्ता तथा अमर है, इसलिए मूर्तिपूजा अनावश्यक है। ब्रम्ह समाज के भवन में किसी मूर्ति, चित्र की पूजा करने की अनुमति नही थी। वे धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन या पूजा में भी विश्वास नही रखते थे क्योंकि उनके अनुसार कोई भी पुस्तक त्रुटिरहित नही हो सकती है।हिन्दू धर्म का सुद्धिकरण एवं  एकेश्वरवाद या निर्गुण परमात्मा में विश्वास , ब्रम्ह समाज का प्रमुख उद्देश्य था। उनके ये उद्देश्य तर्क एवं वेदों तथा उपनिषदों की शिक्षाओ पर आधारित थे। ब्रम्ह समाज ने सर्व धर्म सम भाव पर बल दिया। उनके अनुसार सभी धर्मों में सत्य निहित है, अतः व्यक्ति को अपने धर्म के साथ सभी धर्मों का आदर करना चाहिए। ब्रम्ह समाज , नैतिकता पर बल देता थैवम कर्मफल में उसका विश्वास था।ब्रम्ह समाज के सभी कार्यो में अहिंसा का प्रमुख स्थान था।
Posted on by