संवहनीय वर्षा

संवहनीय वर्षा गर्म व आर्द्र वायु क्षेत्र की विशेषता है। ठंडी हवा जब गर्म धरातल के सम्पर्क में आती है तथा ऊपर की ओर उठती है। वायु के ऊपर उठने से उसके तापमान में कमी आती है तथा कुछ हजार मीटर की ऊंचाई पर वायु का तापमान आसपास स्थित हवा के तापमान के बराबर हो जाता है। ऐसी स्थिति में हवा का ऊपर की ओर उठना रुक जाता है। इस ऊंचाई पर संघनन होना अथवा न होना वायु के सापेक्ष आर्द्रता पर निर्भर करता है। कभी कभी इस व्यवस्था में पहुँचने से पहले ही संघनन शुरू हो जाता है, तथा संघनन की प्रक्रिया के दौरान ताप उत्पन्न होता है। इस अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत के वायु पुनः ऊपर की ओर उठने लगती है तथा ऊपर जाकर वायु के तापमान में कमी आती है। जब तापमान ओसांक बिंदु के नीचे चला आता है, तब संघनन की प्रक्रिया होती है तथा बारिश होती है। अतः जब :-

  1. धरातल पर्याप्त गर्म हो ।
  2. हवा में सापेक्ष आर्द्रता हेतु पर्याप्त आर्द्रता हो ।

तो बहुत मोटे कपासी मेघो का निर्माण होता है। चूंकि संवहन वर्षा  मुख्यतः पृथ्वी की सतह के गर्म होने से हो ती है अतः इस के लिए  अनुकूल  परिस्थितिया     अधिकतर    गर्मी में मिलती हैं। हालांकि मात्र धरातल  का गर्म होना ही    संवहन वर्षा के लिए पर्याप्त नहीं है।

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