चक्रवातीय वर्षा

ऐसी वर्षा वाताग्र अभिसरण क्षेत्रों में होती है। वाताग्र वर्षा विशेष रूप से ध्रुवीय वाताग्र क्षेत्र में देखने को मिलती है। जब क्षैतिज अवस्था में वायु का अभिसरण होता है तब वायु तिरछी अवस्था मे ऊपर की ओर उठती है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समान तापमान तथा घनत्व वाली वायु राशियों का अभिसरण देखने को मिलती हैं, परन्तु उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से बाहर , अधिकतर विपरीत तापमान तथा घनत्व वाले वायु राशियों का अभिसरण देखने में आता है यहाँ गर्म हल्की वायु राशि , ठण्डी घनी वायु राशि द्वारा अवरोध पैदा किये जाने के कारण ठण्डी वायु राशि के ऊपर चढ़ कर वाताग्र का निर्माण करती है।

संवहनी धाराओं के विपरीत , चक्रवात तथा वाताग्र क्षेत्रो में गर्म वायु ठंडी वायु के ढलवा सतह पर धीरे धीरे ऊपर की ओर चढ़ती हैं और ठंडा होने में अधिक समय लेती है। इस प्रक्रिया में वर्षा का सृजन होता है , जो तूफानी वर्षा से कम प्रभाव पूर्ण होती है तथा विस्तृत क्षेत्र में धीरे धीरे परन्तु लम्बे समय तक वर्षा करती  है।   ऐसे वाताग्र तथा उससे    सम्बन्धित      मौसमी   घटनाओं का विकास       विशेष रूप से मध्य अक्षांश  में ठण्डे मौसम में देखने को मिलता  है। मध्य    अक्षांंशों के     निचले इलाकों में,     शीत ऋतु में होनेे वाली अधिकतर वर्षा     चक्रवातीय किस्म की  होती है।

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