भू-स्खलन तथा स्थलाकृति

चट्टानों से दूर दूर तक सन्धियों का निर्माण है जिनका धीरे धीरे विकास होता है। अपक्षय की क्रिया से चट्टाने सन्धियों के सहारे बड़े पैमाने पर टूट फूट जाती हैं। ये पदार्थ नीचे सरकना प्रारम्भ करते हैं। तब इसे भूस्खलन की संज्ञा प्रदान की जाती है। भूस्खलन प्रत्येक दशा में नही होता है बल्कि इसके लिए कुछ आवश्यक परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। निम्नलिखित कारणों से भूस्खलन होता है :-

  1.  भ्रंश रेखाओं के निर्माण के बाद जब किसी भाग का उत्थान हो जाये अथवा धंसाव हो जाये तब भ्रंश रेखा के सहारे तीव्र ढाल का विकास हो जाता है। इस तीव्र ढाल के सहारे तब तक भूस्खलन होता रहता है जब तक एक ढाल मन्द नही हो जाता है।
  2. कुछ चट्टानों में चिकनापन अधिक होता है । जब ये जल के सम्पर्क में आती है तब चिकनाहट की और वृद्धि हो जाती है फलस्वरूप पदार्थ नीचे फिसलने लगते हैं।
  3. भूकम्पीय लहरों के प्रभाव से चट्टाने टूट जाती हैं और ढाल के सहारे नीचे सरकने लगती हैं।
  4. ऊंचाई से कोई पत्थर का टुकड़ा किसी कारण  से नीचे सरकना प्रारम्भ करता है तो मार्ग में     पड़ने वाले   अन्य  पत्थर के   टुकड़ों को धक्का देकर नीचे  सरकने के लिए बाध्य     कर देता है

इन क्रियाओं से भूस्खलन होता है।

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