अथर्ववेद के अनुसार राजा को आय का 1/16वां भाग मिलता है।
ऋग्वेद काल में बली एक स्वेच्छाकारी था जबकि उत्तर वैदिक काल में बलि एक नियमित व्यवस्था हो गया।
ऐतरेय ब्राह्मण में चारों वर्णों के कर्तव्यों का उल्लेख है।
शतपथ ब्राह्मण में सर्वप्रथम महाजनी प्रथा का उल्लेख हुआ है तथा कुसुदिन शब्द का प्रयोग सूदखोर के लिए किया गया।
अथर्व वेद में सभा तथा समिति को प्रजापति की पुत्रियां कहा गया है।
ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार पुत्री ही समस्त दुखों का स्रोत है किंतु पुत्र परिवार का रक्षक है। ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को कृपाल कहा गया है।
शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि वह वैवस्वत मनु के समय में एक ऐसा जल प्लावन आया था जिसके कारण प्रलय जैसी स्थिति हो गई
वाजसनेयी संहिता में सर्व प्रथम वैश्व शब्द का प्रयोग किया गया है।
शतपथ ब्राह्मण के अनुसार राजा वही है जिसे प्रजा का अनुमोदन प्राप्त हो।
छादोग्य उपनिषद के अनुसार कुरु जनपद में कभी ओले नहीं पड़े एवं टिड्डियों के कारण कभी फसल नष्ट नहीं हुई।
अथर्व वेद में राजा परीक्षित को मृत्यु लोक का देवता कहा गया है।
प्राचीन भरत तथा पुरू कबीले मिलकर कुरु जनपद का निर्माण किए जिसकी पूर्व राजधानी आसंदीवत थी।
प्राचीन क्रिवी और तुर्वस कबीले आपस में मिलकर पांचाल का निर्माण किए। पांचाल की प्राचीन राजधानी कांपिल्य थी तथा यहां का प्रमुख शासक
प्रवाहन जैनीली हुआ। पांचाल का ही एक अन्य प्रमुख शासक का नाम आरुनीश्वेतकेेेतु है।