भूकम्पों का स्थलाकृति पर कोई खास महत्वपूर्ण प्रभाव नही पड़ता है किंतु फिर भी कुछ छोटे मोटे प्रभाव देखने को मिलते हैं। कहीं चट्टानें ऊपर की ओर उठ जाती हैं और कहीं नीचे की ओर धंस जाती हैं। पहाड़ों की ढाल पर भूमिस्खलन होते हैं , और भूगर्भीय जल में विक्षोभ के कारण धरती पर दरारें पड़ जाती हैं जिनके अंदर से बालू तथा पानी निकलते हैं जिसके कारण कभी कभी झीलें बन जाती हैं। इन परिवर्तनों का स्थलाकृति की दृष्टि से केवल स्थानीय महत्व है और इन से अनावृत्ति करण में सहायता मिलती है । महादेशिय ढाल पर बड़ी मात्रा में भीगी तलछट , भूकम्पों के कारण फिसल कर नीचे गिर जाती है । किंतु फिर भी मोटे तौर पर यह कहना प्रायः सत्य होगा कि भूकम्प के कारण किसी क्षेत्र की स्थलाकृति में महत्वपूर्ण परिवर्तन नही होते।
किन्तु मानवीय दृष्टि से भूकम्पों के प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जिनसे जान और माल की बहुत बर्बादी होती है , और इनके विनाशक भयानक रूप से मनुष्य सदा से परिचित रहा है । सबसे अधिक हानि घने आबादी क्षेत्रो में होते हैं। कुछ ही क्षणों में हजारों मकान टूटकर धराशायी हो जाते हैं, सड़के फट जाती है , तथा रेल की पटरियां टेढ़ी मेढ़ी हो जााती ।