सती प्रथा - तथ्य एक दृष्टि में

ऋग्वेद में इसका उल्लेख नहीं मिलता है। अथर्ववेद से सती प्रथा की औपचारिकता पूरी करने के लिए पत्नी अपने पति की चिता पर लेटती थी।

सिंधु सभ्यता में सती प्रथा व पर्दा प्रथा नहीं थी।वैदिक समाज में सती प्रथा नहीं प्रचलित थी ।चौथी सदी ईसा पूर्व तक सती प्रथा का प्रचलन भारतीय समाज में नहीं था।

रामायण के मूल अंश में इसका उल्लेख नहीं है किंतु उत्तरकांड में वेदवन्ती की माता के सती होने का उल्लेख है।

महाभारत में इस प्रथा का कम उल्लेख मिलता है, पांडु की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी माद्री सती हो गई थी। जबकि अभिमन्यु, घटोत्कच तथा द्रोण की पत्नी सती नहीं हुई थी।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सती प्रथा का कोई प्रमाण नहीं मिलता है किंतु यूनानी लेखों ने उत्तर पश्चिम में सैनिकों की स्त्रियों के सती होने का उल्लेख किया है। संगम काल में सती प्रथा का प्रचलन था। यह प्रथा विशेषकर उच्च सैनिक वर्गों में था।

सती प्रथा के प्रचलन का प्रथम अभिलेखीय प्रमाण गुप्त काल का है। 510 ईसवी के एरण अभिलेख से पता चलता है कि गुप्त नरेश भानु गुप्त का मित्र गोपराज हूणों के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया तथा उसकी पत्नी का अग्नि में जलने का उल्लेख मिलता है।

गुप्तोत्तर काल में हर्षचरित से पता चलता है कि प्रभाकर वर्धन की पत्नी यशोमती अपने पति की मृत्यु से पूर्व ही सती हो गई थी।

कल्हण की राजतरंगिणी से सती प्रथा के अनेक उदाहरण मिलते हैं। विजय नगर साम्राज्य में सती प्रथा स्त्रियों द्वारा अपने पति के मृत्यु के बाद मुक्ति का प्रतीक माना जाता था, परंतु यह स्वैच्छिक होती थी।

मुगल शासक अकबर ने सती प्रथा रोकने का प्रयास किया किंतु उसे सफलता नहीं मिली।

1929 ईस्वी में भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक सती प्रथा को प्रतिबंधित करने के लिए कानून को लागू करवाने में राजा राममोहन राय ने सरकार की मदद की थी ।अंततः सती प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया।

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