उत्तर वैदिक काल मे आए परिवर्तन

उत्तर वैदिक काल में कृषि लोगों का मुख्य व्यवसाय बन गया था। खेती की प्रक्रिया शुरू करने के लिए अनेक धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ किए थे। इसमें यह भी कहा गया कि हल चलाने के लिए 6 या 8 जोड़ी बैल जोते जाते थे। भैंसे को खेती के उद्देश्य से घरों में पाला जाता था।

दलदली भूमि पर हल चलाने के लिए यह पशु बहुत ही उपयोगी था। इंद्र देवता को इस काम में नया उपनाम कृषि का देवता दिया गया था।

उत्तर वैदिक काल में आर्य सभ्यता के विस्तार का एक मुख्य तत्व 1000 ईसा पूर्व के आस पास लोहे प्रयोग की शुरुआत होना था। उत्तर वैदिक काल के लोग अयस नाम की जिस धातु से परिचित थे वह शायद ताँबा या कांसे से रही होगी। उत्तर वैदिक काल में अयस के साथ श्याम या कृष्ण का विशेषण शब्द जोड़ा गया, जिसका अर्थ काला और इसे लोहे के संकेतक के रूप में माना जाता था।

पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि लोहे का प्रयोग 1000 ईसा पूर्व आसपास उत्तर प्रदेश के एटा जिले के अतरंजिखेरा से प्रमाण मिलता है, जिसे उत्तर वैदिक साहित्य का काल माना जाता है।

भारत के उत्तरी और पूर्वी भागों में भारत के उत्तर पश्चिमी भागों से अधिक वर्षा होती थी, जहां बाद में आर्य लोग स्थानांतरित हुए थे। वर्षा के परिणाम स्वरुप यह क्षेत्र घने जंगलों से भरा था जिनकी समाप्ति ऋगवैदिक काल के लोगों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले तांबा या पत्थर के औजारों से होना संभव नहीं था। घने वर्षा वाले वनों का अच्छे ढंग से समाप्त करने के लिए लोहे के औजारों की सहायता की थी।

लोहे से बने औजार व उपकरणों के प्रयोग करने के प्रभाव के साक्ष्य उत्तरवैदिक काल के अंतिम चरण में ही ज्ञात हुए।

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