वैदिक सभ्यता का विकास ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार पर हुआ। ईरान की धार्मिक पुस्तक ‛जिंद अवेस्ता’ में इस बात के संकेत हैं कि आर्य ईरान के रास्ते भारत आए थे।
आरंभ में आर्यों के कुटुंब,कुल या परिवार रक्त संबंधों पर आधारित थे जिनका प्रधान कुुुलप या कुलपति कहलाता था। वह परिवार का मुखिया होता था। अनेक परिवारों को मिलाकर ग्राम बनता था। जिनका प्रधान ग्रामणी कहलाता था। अनेक ग्रामो को मिलाकर विश बनता था जिसका प्रधान विशपति होता था। कुटुम्ब सबसे छोटी प्रशासनिक इकाई थी ।
अनेक विशो का समूह जन या कबीला कहलाता था। जिसका प्रधान राजा या राजन गोप होता था।
जनपद राष्ट्र या राज्य की अवधारणा भी वैदिक काल के उत्तरार्ध में स्थापित हुई। शासन का प्रधान राजन हुआ करता था।
राज्याभिषेक के अवसर पर ग्रामीणी रथकार तथा कर्मकार उपस्थित रहते थे इन्हें रत्नीन कहा गया। इनमें ग्रामीणी गांव का मुखिया होता था।
ऋगवैदिक समाज का आधार परिवार था परिवार पितृ सत्तात्मक होता था। आर्य लोगों का विवाह दास तथा दस्युओ के साथ निषिद्ध था। सोमरस आर्यों का मुख्य पेय पदार्थ था।
तकनीकी विकास के दृष्टिकोण से इस काल में लोहे का प्रयोग सर्वाधिक महत्वपूर्ण था इस युग में लोहे को कृष्ण कहा जाता था।
इस समय राजा की पटरानी महिषी कहलाती थी जो प्रशासनिक कार्यों में राजा की सहायक एवं सलाहकार के रूप में करती थी।
इस युग में मिट्टी के एक विशेष प्रकार के बर्तन बनाए जाते थे जिन्हें चित्रित धूसर मृदभांड कहा जाता था।
इस काल की अर्थव्यवस्था को प्राक शहरी अर्थव्यवस्था का नाम दिया जा सकता है क्योंकि ये न तो पूरी तरह ग्रामीण और ना ही शहरी थी।
इस काल में प्रजापति को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हो गया था।
पूषन शूद्रों के देवता के रूप में प्रतिष्ठित थे।