जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु होना एक शाश्वत सत्य है। नश्वर शरीर के शिथिल होने की स्थिति में जीवन के अंतिम क्षण तक धर्म साधना के साथ जीवन यापन ही संथारा या सल्लेखना है।
जैन धर्म के 2 पंथ श्वेतांबर और दिगंबर हैं। संथारा श्वेतांबरो में प्रचलित है जबकि दिगंबर इस परंपरा को सल्लेखना कहते हैं। यह जैन समाज में 1000 वर्ष पुरानी प्रथा है। 257 A.D में सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला कर्नाटक में सल्लेखना विधि द्वारा ही अपने शरीर का त्याग किया था।
31 अगस्त 2015 को उच्चतम न्यायालय ने जैन समुदाय को बड़ी राहत प्रदान करते हुए संथारा प्रथा को प्रतिबंधित करने के राजस्थान हाई कोर्ट के निर्णय पर रोक लगा दी ।
10 अगस्त को राजस्थान उच्च न्यायालय ने इस प्रथा को आत्महत्या जैसा अपराध बताते हुए प्रतिबंधित कर दिया था।
जैन समाज की संथारा प्रथा एक प्रकार की सती प्रथा के समान है। सती प्रथा आत्महत्या की श्रेणी में आती है तो संथारा को भी इसी श्रेणी में माना जाता चाहिए।
राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुनील अंबवानी और वी एस सिराधना ने कहा था कि संथारा लेने वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 306 के अंतर्गत आत्महत्या का प्रयास कार्यवाही की जानी चाहिए।
जैन समुदाय के लोगों का कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक भारतीय को अपने धर्म को अवैध रूप से मान्य और उसका आचरण एवं प्रचार करने का अधिकार है।
बेंगलुरु विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति न्यायमूर्ति टी.के. टुकोल ने इस विषय पर एक पुस्तक लिखी है जिसका शीर्षक सल्लेखना इज नॉट सुसाइड है।
“संथारा-ए-चैलेंज टू इंडियन सेक्युलरिज्म” संथारा विषय पर बना एक वृत्तचित्र है जिसके निर्देशक प्रोफेसर शेखर हटटगड़ी है।