वर्ष 1975 में 1008 भगवान महावीर स्वामी जी के 2500 वें निर्वाण वर्ष के अवसर पर समस्त जैन समुदायों ने जैन धर्म के प्रतीक चिन्ह का एक स्वरुप बनाकर उस पर सहमति प्रकट की थी।इस प्रतीक चिन्ह का रूप जैन शास्त्रों में वर्णित तीन लोक के आकार जैसा है। इसका निचला भाग अधोलोक बीच का भाग मध्य लोके और ऊपर का भाग ऊर्ध्वलोक का अनंत काल से अनंत काल तक के लिए विराजमान है।
चिह्न के निचले भाग में प्रदर्शित हाथ अभय का प्रतीक है और लोक के सभी जीवो के प्रति अहिंसा का भाव रखने का प्रतीक है। हाथ के बीच में 24 आरों वाला 24 तीर्थंकरों द्वारा प्रणीत जिन धर्म को दर्शाता है, जिसका मूल भाव अहिंसा है। ऊपरी भाग में प्रदर्शित स्वास्तिक की चार भुजाएं चार गतियों ( 1- नरक 2- त्रियन्च 3- मनुष्य 4- देव) का द्योतक है।
प्रत्येक सांसारिक प्राणी जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त होना चाहता है। स्वास्तिक के ऊपर प्रदर्शित तीन बिंदु ( 1- सम्यक दर्शन 2- सम्यक ज्ञान 3- सम्यक चरित्र ) को दर्शाते हैं और संदेश देते हैं कि सम्यक दर्शन के बिना प्राणी मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता है।
सबसे नीचे लिखे गए सूत्र प्रस्प्रोपग्रहो जीवानाम का अर्थ प्रत्येक जीवन परस्पर एक दूसरे का उपकार करें यही जीवन का लक्षण है। जैन प्रतीक चिन्ह सांसारिक प्राणी मात्र की वर्तमान दशा एवं इससे मुक्त होकर सिद्ध शिला तक पहुंचने का मार्ग दर्शाता है।