हीनयान और महायान

                         हीनयान

इसे श्रावकयान प्रत्येक बुद्धयान कहा जाता है ।हीनयान का शाब्दिक अर्थ हीनयान है यह व्यक्ति वादी धर्म है अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयत्नों से मोक्ष प्राप्त करनी चाहिए। हीनयानी महात्मा बुद्ध के अप्प दीपो भव को अपना मूल मंत्र मानते हैं यह महात्मा बुद्ध को महापुरुष मानता है देवता नहीं।

हीनयान त्रिकाय की संकल्पना में विश्वास नहीं रखते हैं। हीनयान में वृद्ध की मूर्ति पूजा नहीं अपितु बोधि वृक्ष धर्म चक्र स्तूप प्रतीकों की पूजा विधान था। हीनयान का आदर्श अर्हत पूज्य पद प्राप्त करना है जो व्यक्ति अपने साधना से निर्वाण प्राप्तकर्त अर्हत कहलाते हैं जैसे यवन शासक मिनाण्डर।

हीनयान का प्रमुख संप्रदाय वैभाषिक व सौत्रांतिक है। हीनयान में केवल पुद्गल शून्यता का उल्लेख है हीनयान के ग्रंथ सामान्यतः पाली भाषा में है। हीनयान का प्रमुख साहित्य कथावस्तु विशुद्ध मग्ग, अवदान शतक है। हीनयान के प्रमुख दार्शनिक वसुबंधु, कुमार लात,  इत्सिंग है।

                          महायान

इसे बुद्धयान बोधिसत्वयान एकयान एवं श्रेष्ठयान से संबोधित किया जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ उत्कृष्ट मार्ग है। यह समस्तीवादी धर्म है जिसका उद्देश्य समस्त मानव जाति का कल्याण करना है। महायान में बुद्ध को देवता का दर्जा प्राप्त है। महायान में आत्मा एवं पुनर्जन्म को स्वीकार किया गया है। जबकि महात्मा बुद्ध अनात्मवादी थे।

महायान त्रिकाय धर्मकाय निर्माणकाय एवं संभोगकाय की संकल्पना के समर्थक थे।महायानी मूर्तिपूजक थे और इसमें तीर्थों को महत्व दिया जाता है। महायान का अर्थ बोधिसत्व प्राप्त करना है। महायान का प्रमुख संप्रदाय पूर्व शैल भदयानीय शून्यवाद विज्ञानवाद है। महायान में पुद्गल शून्यता एवं धर्म शूून्यता दोनों का उल्लेख है। महायान के ग्रंथ सामान्य: संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं। महायान का अष्टमा हस्त्रिका प्रज्ञापारमिता प्राचीनतम ग्रंथ है। महायान के प्रमुख दार्शनिक नागार्जुन, असंग, ह्वेनसांग, मैत्रेय वसुबंधु है।

                     दर्शन/धर्म

दर्शन सत्य का शुद्ध रूप दिखाता है और धर्म जीवन को सही दृष्टि देता है तथा उसकी प्राप्ति करवाता है। दर्शन सिद्धांत है और धर्म अभ्यास है।

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