बौद्ध संघ

बौद्ध संघ का संगठन गण तांत्रिक प्रणाली पर आधारित था। संघ में प्रवेश पाने के लिए गृहस्थ जीवन का त्याग व कम से कम 15 वर्ष की आयु का होना आवश्यक था। माता पिता की आज्ञा के बिना कोई भी व्यक्ति इस में प्रवेश नहीं पा सकता था। अस्वस्थ, शारीरिक विकलांग,ऋणी,  सैनिक और दासों का संघ में प्रवेश वर्जित था। संघ की सभा में प्रस्ताव को नत्ति या वृत्ति कहा जाता था । जबकि प्रस्ताव पाठ को अनुसावन कहते थे। बहुमत से पारित प्रस्ताव भूकस्किम कहा जाता था। किसी भी प्रस्ताव पर मतभेद को अधिकरण कहा जाता था मतभेद पर मत विभाजन या मतदान होता था।

मतदान गुल्हक ( गुप्त ) तथा विवतक ( प्रत्यक्ष ) दोनों से होता था सभा में बैठने की व्यवस्था करने वाला अधिकारी आसन प्रज्ञापक कहलाता था। इसकी बैठक के लिए न्यूनतम उपस्थिति ( कोरम ) 20 थी।

जब किसी विशेष अवसर पर सभी भिक्षु-भिक्षुणियों धर्म वार्ता के लिए एकत्रित होकर धर्म वार्ता करते थे तो उसे उपोसथ कहते थे।

संघ में प्रविष्टि होने को उपसंपदा कहा जाता था गृहस्थ जीवन का त्याग प्रवज्या कहलाता था।

प्रवज्या ग्रहण करने वाले को श्रामणेर कहते थे श्रामणेर किसी आचार्य से शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद उपसंपदा का अधिकारी बन जाता था। इसके लिए उसे 20 वर्ष की आयु का होना आवश्यक था। श्रामणेरों को 10 शिक्षाओं का पालन करना पड़ता था जिसे शिक्षापद कहा जाता था।

बौद्ध धर्म के अनुयाई दो वर्गों (

1- भिक्षु/भिक्षुणी 2- उपासक/उपासिकाएं ) में बंटे हुए थे। गृहस्थ जीवन में रहकर ही बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों को उपासक कहा जाता था। बौद्ध दैनिक प्रार्थनाओं में बुद्ध शरणम् गच्छामि।धम्मम शरणम गच्छामि।। का उच्चारण करते हैं।

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