अम्लीय वर्षा

प्राकॄतिक रूप से ही अम्लीय होती है। इसका कारण यह है कि पॄथ्वी के वायुमंडल में सल्फर डाइआक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जल के साथ क्रिया करके नाइट्रिक अम्ल और गंधक का तेजाब बन जाता है।

अम्लवर्षा में अम्ल दो प्रकार के वायु प्रदूषणों से आते हैं : SO2 और NO2, ये प्रदूषक प्रारंभिक रूप से कारखानों की चिमनियों, बसों व स्वचालित वाहनों के जलाने से उत्सर्जित होकर वायुमंडल में मिल जाते है।

इस प्रकार के अम्ल एरोसॉल मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा होते हैं। अम्ल वर्षा द्वारा वनों और झीलों को क्षति पहुंचती ही है, इससे भवन निर्माण सामग्री जैसे : इस्पात, पेंट  प्लास्टिक, सीमेंट, चूना पत्थर , बालू पत्थर तथा संगमरमर को भी बहुत नुकसान होता है। अतः इसके प्रभाव को कम करने के लिए उस क्षेत्र विशेष में हरित प्रौद्योगिकियों व पर्यावरण अनुकूल तकनीक के प्रयोग पर बल दिया जाना चाहिए।

अम्लवर्षा के दुष्परिणाम

अम्लवर्षा के कारण जलीय प्राणियों की मृत्यृ खेंतो और पेड़-पौधों की वृद्धि में गिरावट, तांबा और सीसा जैसे घातक तत्वों का पानी में मिल जाना, ये सभी दुष्परिणाम देखे जा सकते है। जर्मनी व पश्चिम यूरोप में जंगलो के नष्ट होने का कारण भी अम्लवर्षा ही है। मनुष्यों पर भी इसका परिणाम गंभीर होता है।

समस्या का समाधान

इस समस्या का समाधान एक ही प्रकार से संभव है। इसके लिये घातक वायु और पदार्थ के स्रोत जहाँ से ये प्रदूषक उत्पन्न हो रहे हैं, उनकों वहीं पर नियंत्रित करना और वे सभी व्यक्ति और संस्थाएं जो इस विषय पर कार्यरत है उन्हें सारी जानकरी देना है।

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