मूल शिक्षा की वर्धा योजना

1937 में महात्मा गांधी ने अपने पत्र हरिजन में एक शिक्षा योजना चालू किया । जिसे ' बेसिक एजुकेशन ऑफ वर्धा स्कीम'  की संज्ञा दी गई।  इसे 'आधारभूत शिक्षा' या ' बुनियादी शिक्षा'  या 'नई तालिम' या 'बुनियादी तालीम' कहकर पुकारा गया। इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें की गई थी:-

  1. इसमें सार्वभौम अनिवार्य निशुल्क शिक्षा की बात की गई इसके अनुसार देश में 7 वर्ष से ऊपर के सभी बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाए।
  2. बेसिक शिक्षा का दूसरा मूल सिद्धांत मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान करना। गांधीजी मातृभाषा के प्रबल समर्थक थे।
  3. इसका तीसरा सिद्धांत उद्योग केंद्रित शिक्षा को बढ़ावा देना था। इसका तात्पर्य है पढ़ने लिखने के साथ-साथ किसी उद्योग को भी सीख लिया जाए। उनका यह मानना था कि लड़कों को जो कुछ भी सिखाया जाए वह किसी न किसी उद्योग या दस्तकारी के जरिए ही सिखाया जाए।  इसे ही करके सीखने का सिद्धांत कहा गया। इसने अध्यापकों के प्रशिक्षण पर्यवेक्षण प्रशासन के सुझाव भी दिए ।
  4. बेसिक शिक्षा का 14 सिद्धांत है स्वावलंबन इसके अंतर्गत दस्तकारी के जरिए विद्यार्थी जो कुछ पैदा करें, उसकी कीमत से शिक्षक का खर्च निकल सके। इस सिद्धांत के सबसे अधिक आलोचना हुई।

हरिपुरा में जब कांग्रेस अधिवेशन में बेसिक शिक्षा की स्वीकार करने के लिए प्रस्ताव रखा गया था, तो 'आचार्य नरेंद्र देव' जैसे व्यक्तियों ने भी स्वावलंबन के सिद्धांत की आलोचना की थी। उनका कहना था - कि इससे बालकों का शोषण होता है।

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