हिमालय क्षेत्र भंगुर पारिस्थितिकी का उदाहरण है। अतः मानव के अनियंत्रित क्रियाकलापों से यहां पारिस्थितिकी की संतुलन बिगड़ रहा है।
हिमालय क्षेत्र में विगत कुछ वर्षों में वनों की अंधाधुंध कटाई हुई है, जो अत्यंत चिंता का विषय है। हिमालय क्षेत्र में वनों की ह्रास दर 2-3 दशको में विभिन्न कारणों से तीव्र हुई है । यहां वन विनाश के कारणों में प्रमुख है- बांध एवं जलाशयों का निर्माण, सड़क तंत्र का अनियोजित विकास, व्यापारिक एवं औद्योगिक मांगों की पूर्ति हेतु बड़े पैमाने पर वृक्षों का कांटा जाना, स्थानांतरित कृषि पद्धति, वनों में आग लगना, कृषि हेतु वन काटन से हिमाचल में सेब की कृषि आदि ।
स्थानांतरित कृषि पद्धति( झूमिंग कृषि) पूर्वी हिमालय के राज्य में वनों के विनाश का प्रमुख कारण है । जबकि उत्तरांचल हिमालय तथा कश्मीर में अत्यधिक पशु चारण, व्यापारिक फसलों का उत्पादन, विकास कार्यों हेतु सड़क, बांध तथा जलाशयों के निर्माण इत्यादि से बड़े पैमाने पर वनों का ह्रास हुआ है ।
हिमालय क्षेत्र में वनों के विनाश के कारण मृदा अपरदन की गति तीव्र हुई है । एक अनुमान के अनुसार लगभग ढाई सौ मिलियन क्यूबिक मीटर मिट्टी की ऊपरी परत प्रतिवर्ष बह जाती है ।
पहाडी ढालों के अनाच्छदन के परिणाम स्वरूप हुए बड़े पैमाने पर मिट्टी के अपरदन के कारण हिमालय क्षेत्र में पर्यावरण संबंधी निम्नलिखित समस्याएं विकराल रूप धारण कर दी जा रही है:
- नदियों तथा जलाशयों में गादो का जमाव।
- बारंबार बाढो का आना।
- भूस्खलन बढ़ना ।
- मिट्टी की उर्वरा शक्ति का लगातार ह्रास होना
- मिट्टी में नमी का कम होना।
- छोटी सरिताओं का शुष्क होते जाना।
- वर्षा की मात्रा में कमी एवं परिवर्तन शीलता में वृद्धि ।
- हिम रेखा का ऊपर खिसकना।
- तीव्र गति से हिम का पिघलना इत्यादि ।
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय क्षेत्र में वनों के विनाश तथा लगातार दोहन ने वहां के परिस्थितिकी तंत्र को व्यापक क्षति पहुंचाई है।