स्तूप क्या है ?

महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को 8 भागों में बांटा गया तथा उन पर समाधियों का निर्माण किया गया। सामान्यत: इन्हीं को स्तूप कहा जाता है।

स्तूप के निर्माण की प्रथा बुद्ध काल के पूर्व की है स्तूप का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का ढेर होता है चूकि यह चिता के स्थान पर बनाया जाता है अतः इसका एक नाम चैत्य भी हो गया।

स्तूप का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में प्राप्त होता है जहां अग्नि की उठती हुई ज्वालाओ को स्तूप कहा गया है बुद्ध के पहले ही स्तूप का संबंध महापुरुष के साथ जुड़ गया था।

मौलिक रूप में स्तूप का संबंध मृतक संसार से था। शव दाह के बाद बची हुई अस्थियों को किसी पात्र में रखकर मिट्टी से ढक देने की प्रथा से स्तूप का जन्म हुआ । कालांतर में बौद्धों ने इसे अपनी संघ पद्धति में अपना लिया।

इन स्तूपों में बुद्ध अथवा उनके प्रमुख शिष्यों की धातु रखी जाती थी अतः वे बौद्धों की श्रद्धा व उपासना के प्रमुख केंद्र बन गए।

                      4 प्रकार के स्तूप

1- शारीरिक:      इनमें बुद्ध तथा उनके प्रमुख

शिष्यों की अस्थियों तथा उनके शरीर के विभिन्न अंग ( दन्त, नख, केश ) रखे जाते थे।

2- पारिभौगिक:     इनमें बुद्ध द्वारा उपयोग में लाई गई वस्तुएं (भिक्षा पात्र, चरण पादुका, आसन) रखे जाते थे।

3- उद्देशिक:       इनमें वे स्तूप आते थे जिन्हें महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित अथवा उनकी यात्रा से पवित्र हुए स्थानों पर स्मृति रूप में निर्मित किया जाता था। ऐसे स्थल बोधगया, लुंबिनी, सारनाथ, कुशीनगर में है।

4- संकल्पित:     यह छोटे आकार के होते थे और इन्हें बौद्ध तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं द्वारा स्थापित किया गया था। बौद्ध धर्म में इसे पुण्य का काम बताया गया है।

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