छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में जैन और बौद्ध धर्म के उदय के अतिरिक्त कुछ अन्य संप्रदायों का भी उदय हुआ था। जो कट्टरपंथी थे। इनमें सबसे प्रमुख भागवत व शिव भागवत संप्रदाय है। जिनका उत्तरोत्तर विकास होता गया उनके अनुसार भक्ति द्वारा ही ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। यज्ञ, बली व पूजा के द्वारा नहीं। इस मत को मानने वाले भागवत कहलाते थे। इनका केंद्र मथुरा था। इस मत के प्रवर्तक वासुदेव माने जाते हैं। वह यादवों के वृष्णिशाखा या सात्वत के प्रधान थे। बाद में वासुदेव ने, जो कृष्ण माने जाते थे, इस संप्रदाय को लोकप्रिय बनाया।
कृष्ण के जीवन व उनकी लीलाओं से संबंध अनेक रोचक कथाओं का सृजन किया गया है । जिनकी झलक महाभारत में मिलती है। इस धर्म का मूल तत्व श्रीमद्भागवत गीता ईशा की चौथी शताब्दी में संग्रहित है। आगे चलकर भागवत संप्रदाय वैष्णव धर्म में परिवर्तित हो गया।
गीता में कृष्ण को निष्काम कर्म और कर्म योग भक्ति योग प्रतिपादित करते हुए दिखाया गया है।
गीता के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति के तीन मार्ग जो ज्ञान मार्ग, कर्म मार्ग और भक्ति मार्ग हैं। ज्ञान मार्ग अत्यंत कठिन और दुरूह है परंतु कर्म मार्ग द्वारा मनुष्य अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
वैष्णव धर्म के सिद्धांत
वैष्णव धर्म की एक प्रमुख विशेषता इसकी अवतारवाद की संकल्पना है। अवतारवाद का सामान्य अर्थ ऊपर से नीचे आना, उतारना , शरीर धारण करना, जन्म ग्रहण करना, प्रादुर्भाव, अवतरण, व अंशोद्भव है। अवतार शब्द भगवान विष्णु अथवा देवताओं के अवतरण के लिए प्रयुक्त होता है।
अमरकोश व गीत गोविंद में विष्णु के 39 अवतारों का उल्लेख मिलता है, परंतु वास्तविक रूप में दशावतार सर्वाधिक प्रचलित हैं।