शैव धर्म

शिव के उपासक शैव कहे गए हैं और इनसे संबंधित धर्म को शव धर्म कहा गया है। यह भारत का प्राचीनतम धर्म है इसकी प्राचीनता आद्य इतिहास ( सिंधु सभ्यता ) तक जाती है क्योंकि मार्शल ने मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा पर अंकित मूर्ति को शिव का प्रारंभिक रूप सिद्ध किया है।

ऋग्वेद में शिव का नाम रूद्र मिलता है वहां के अंतरिक्ष के देवता थे ऋग्वेद में 3 सूक्तों में रुद्र का वर्णन मिलता है। उत्तर वैदिक काल में इनका नाम शिव प्राप्त होता है। अथर्ववेद व श्वेताश्वतर उपनिषद में शिव का एक नाम महादेव मिलता है । रुद्र की पत्नी के रूप में पार्वती का नाम तैत्तिरीय आरण्यक में मिलता है तैत्तिरीय आरण्यक में ही अंबिका का रूद्र की भगिनी के रूप में उल्लेख मिलता है। केन उपनिषद में हिमालय की पुत्री उमाहेमवती का उल्लेख मिलता है।

शिव की प्राचीनतम मूर्ति पहली शताब्दी ईस्वी में मद्रास के निकट रेनीगुंटा में प्रसिद्ध गुडिमल्लम लिंग के रूप में प्राप्त हुई है।

समुद्रगुप्त के समय प्रयाग प्रशस्ति में शिव की जटा से गंगा नदी निकलने का उल्लेख मिलता है।  राजपूत काल में चंदेलों ने खजुराहो में कंडरिया महादेव मंदिर का निर्माण करवाया ।राष्ट्रकूट कृष्ण प्रथम ने एलोरा में प्रसिद्ध शिव मंदिर का निर्माण करवाया। पाल, चंदेल व सेन वंश के अधिकतर अभिलेख ‛ओम नमः शिवाय ’ से प्रारंभ होते थे।

गुजरात के चालुक्य शासक भीम प्रथम ने शिव का प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। महमूद गजनवी द्वारा तोड़ दिए जाने पर अन्हिलवाड़ के चालुक्य के साथ शासक कुमार पाल ने  सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था।

चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धराज ने सोमनाथ मंदिर जाने वाले यात्रियों से तीर्थंकर को समाप्त कर दिया।

 चोल शासक राजा राज प्रथम ने तंजौर में प्रसिद्ध राजराजेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया जिसे बृहदेश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

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