शक्ति को इष्ट देवी मानकर पूजा करने वालों का संप्रदाय शाक्त कहा जाता था। शक्ति का प्रारंभिक रूप से सिन्धुकाल में मातृदेवी की पूजा में दिखाई पड़ता था। शाक्त उपासना गुप्तकाल में अपने चरमोत्कर्ष पर थी ।
पूर्व मध्य काल में देवी की उपासना अत्यंत लोकप्रिय थी। अधिकांश मंदिर इसी युग के बने हैं मध्य प्रदेश के जबलपुर में भेड़ाघाट के पास चौसठ योगिनी का मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है ।
प्रतिहार महेंद्र पाल के लेखो में दुर्गा की महिषासुरमर्दिनी, कंचन देवी, अंबा नामों की स्तुति मिलती है। राष्ट्रकूट अमोधवर्ष ने एक बार अपने बाएं हाथ की अंगुली काटकर देवी को चढ़ा दिया था।
कल्हण की राजतरंगिणी से पता चलता है कि शारदा देवी का दर्शन करने के निमित्त गौड़ नरेश के अनुयाई कश्मीर आए थे। अबुल फजल भी शारदा देवी के मंदिर का विवरण देता है ।
ऐतिहासिक काल में शिव की पत्नी उमा को जगत जननी कहा गया है। शक्ति के रूप में विकसित होकर पार्वती कपिलावर्णा, काली और सिंहवासनी देवी के प्रचंड रूप की पूजा कापालिक और कला मुख जैसे घोरपंथी संप्रदाय के लोग करते हैं।