6 - योग्य सेनापतियों का अभाव -
क्रांतिकारियों के पास योग्य सेनापतियों का अभाव था रानी झांसी , नाना साहब, तात्या टोपे और वीर योद्धा थे परंतु उनमें योग्य अनुभवी सेनापतियों के गुणों का अभाव था युद्ध के दाव - पेचो से अनभिज्ञ थे दूसरी और अंग्रेज सेनापति लारेन्स, हैवलॉक , निकलसन आदि बड़े योग्य अनुभवी सेनापति थे उन्होंने भीषण संकट के अवसर पर धैर्य सूझबूझ से काम लिया और सैनिकों के मनोबल को बनाए रखा ।
7- सामान्य आदर्श का अभाव -
अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी के विद्रोह में क्रांतिकारियों का सामान आदर्श नहीं था बहादुर शाह , कुंवर सिंह, नाना साहब , रानी लक्ष्मी बाई आदि नेता परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढालने चले गए इनमें से किसी ने भी इस विद्रोह की योजना नहीं बनाई थी सैनिकों अथवा सामान्य जनता के विद्रोह आरंभ कर देने के बाद भी कुछ समय तक नेता अंग्रेजों से अपने निजी लाभ और स्वार्थों की उचित व्यवस्था चाहते थे निराशा मिलने पर ही उन्होंने विद्रोहियों का समर्थन किया ।
8- भारतीय कृषक वर्ग की उपेक्षा -
1857 के विद्रोह का नेतृत्व जमींदार तालुकेदार आदि के हाथों में था परंतु देश का कृषक इस वर्ग विद्रोह के प्रति उदासीन रहा बहुसंख्यक कृषकों के समर्थन के बिना इस विद्रोह की सफलता संदिग्ध थी ये कृषक अंग्रेजों की भूमि सुधारों से लाभान्वित हो चुके थे और सामंतों के शोषण व अत्याचार से भलीभांति परिचित थे उन्होंने पुरानी व्यवस्था को लागू करने के लिए विद्रोहियों के प्रयासों को संदेह की दृष्टि से देखा और उनका साथ नहीं दिया इस प्रकार 1857 के विद्रोह जनसाधारण एक आंदोलन ना बन सका और अंग्रेज सरलता से दमन करने में सफल हो गये ।