2- शिशुनाग वंश

इस वंश का संस्थापक शिशुनाग था। यह बनारस के राजा का गवर्नर था। शिशु अवस्था में माता-पिता ने उनका परित्याग कर दिया था उसकी रक्षा एक नाग ने किया था इसलिए शिशुनाग के नाम से प्रसिद्ध हुए।

1- शिशुनाग (412 ईसवी से 394 ईसा पूर्व तक)- 

इसकी सबसे बड़ी सफलता अवंती राज्य को जीतकर उसे मगध साम्राज्य में मिलाना था।इसने अपनी राजधानी वैशाली में स्थानांतरित की थी।

2- कालाशोक या ककवर्ण (394 ईसा पूर्व से 366ई.पू.)- 

इसने अपनी राजधानी पुन: पाटलिपुत्र में स्थानांतरित कर लिया। इस समय के बाद पाटलिपुत्र में ही मगध की राजधानी रही। कालाशोक के शासन काल में वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ। काला शोक की हत्या राजधानी के समीप घूमते हुए किसी व्यक्ति ने छुरा भोंक कर कर दी थी।

महानंदिन या नंदी वर्धन (366 ईसा पूर्व से 344 ईसा पूर्व तक)- 

महाबोधि वंश के अनुसार कालाशोक की हत्या के बाद उसके 10 पुत्र (भद्र सेन,कोर्णदवर्ण, मंगुुरा, सर्वज्ञजह, जालिक, उभक, संजय, कोर्व्य,  नंदी वर्धन, पंचमक) ने संयुक्त रूप से 22 वर्षों तक शासन किया जिसमें सर्व प्रमुख था महानंदिन या नंदी वर्धन।

महानंदिन के शासनकाल में कोई उल्लेखनीय घटना नहीं घटी। महानन्दिन शिशुनाग वंश का अंतिम शासक सिद्ध हुआ। महापद्मा नंद ने शिशुनाग वंश को समाप्त कर एक नए राजवंश की स्थापना की जो नंद वंश के नाम से जाना गया।

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