पुच्छल तारे (धूमकेतु) अंतरिक्ष में चमकीले दिखने वाले पिंड हैं जो सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार पथ पर घूमते हैं।
सर्वप्रथम टायकोब्राहे ने पुच्छल तारे का वर्णन किया।
न्यूटन ने बताया कि पुच्छलतारे सूर्य द्वारा आकृष्ट होते हैं तथा ये दीर्घवृत्ताकार मार्ग में सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
पुच्छल तारे सूर्य के निकट आने पर सूर्य के ज्वारीय बल के कारण क्षतिग्रस्त होकर विखंडित हो जाते हैं ।
सूर्य के निकट आने पर पुच्छलतारे पूँछ विकसित कर लेते हैं तथा पुच्छल तारे की पूँछ सूर्य के विपरीत दिशा में रहती है।
उल्कापिंड पिंड तभी दिखाई पड़ते हैं जब छोटे ठोस कण अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं।
उल्का को समान रूप से टूटता तारा कहा जाता है।
उल्का, धूमकेतु की तरह ही सौर मंडल के सदस्य हैं।
पृथ्वी पर उल्का पदार्थों के संचय से पृथ्वी का द्रव्यमान बढ़ रहा है। द्रव्यमान बढ़ने तथा उल्काओं के पृथ्वी से टकराने से पृथ्वी की अक्षीय गति धीमी हो रही है।
पृथ्वी की सतह पर मिलने वाला सबसे बड़ा उल्कापिंड होबावेस्ट है जो नमीबिया में पाया गया है।