पूना की संधि (13 जून 1817 ई०)

एल्फिस्टन ने बाजीराव द्वितीय से उसकी इच्छा न रहने पर भी 13 जून 1817 ईसवी को पूना की संधि पर हस्ताक्षर करवाया । इस संधि पेशवा को मराठा संघ की प्रधानता छोड़ देनी पड़ी । उसे गायकवाड पर अपने दावों को चार लाख रुपए  में परिवर्तित कर लेना पड़ा तथा उससे आगे मांग न करने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी । उसे अंग्रेजों को  कुमकुम तथा महत्वपूर्ण किलो को समर्पित कर देने पड़े ।

दौलतराव सिंधिया भी अंग्रेजों द्वारा 5 नवंबर 1817 ईस्वी को ग्वालियर की संधि पर हस्ताक्षर करने को  वीवश  किया गया । इसके द्वारा उसने पिंडारीयो  को दबाने में अंग्रेज से सहयोग करने की प्रतिज्ञा की तथा कंपनी को चंबल के पार राज्य से संबंधित स्थापित करने की पूरी स्वतंत्रता दे दी । नागपुर के भोसले ने पूर्व ही 27 मई 1816 ईसवी को अंग्रेजी से सहायक मित्रता की एक संधि पर हस्ताक्षर कर लिया । 6 जनवरी 1818 ईस्वी को मंदसौर की संधि पर हस्ताक्षर करने को विवश किया। इसके अनुसार उसने राजपूत राज्यों पर सभी दावे छोड़ दिया, नर्मदा के दक्षिण के सभी जिले अंग्रेजों को सौंप दिए । इस राज्य के भीतर एक सहायक सेना रखना स्वीकार किया, अपने विदेशीक  संबंध अंग्रेजों के अधीन कर दिया तथा धन-लोलूप  सेनानायक आमिर खा को टोंक का नवाब मान लिया । अब इंदौर में एक स्थायी ब्रिटिश रेजीडेंट रहने लगा

जहां तक पेशवा की बात है किरकी में अपनी पराजय के बाद उसने अंग्रेज से दो और लड़ाई लड़ी - पहली एक जनवरी 1818 ईस्वी कोरगांव में तथा दूसरी 20 फरवरी 1818 ईस्वी को अण्टी में । वह दोनों में पराजित हुआ । दूसरी लड़ाई में उसका योग्य सेनापति गोरावले मारा गया । बाजीराव द्वितीय ने अंन्त में 3 जून 1818 ईस्वी सर जान मेलकम के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। बाजीराव द्वितीय को 8 लाख वार्षिक पेंशन पर कानपुुर के समिप बिठूर में अपने अंतिम दिन बिताने की आज्ञा दी गई । उसका राज्य ब्रिटिश नियंत्रण में ले लिया गया । पेशवा  के राज्य से सातारा का छोटा राज्य निकालकर प्रताप सिंह को दिया गया, जो शिवाजी का सीधा वंशज तथा मराठा साम्राज्य का औपचारिक प्रधान था । मराठा साम्राज्य के अंतिम छत्रपति शाहाजी अप्पासाहेेब हुए ।

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