शाखा की स्थापना ख्वाजा अबू अब्दाल चिश्ती ने किया भारत में इस शाखा का सर्वप्रथम प्रचार-प्रसार ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने किया।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के पिता का नाम गियासुद्दीन और गुरु का नाम ख्वाजा उस्मान हारूनी था ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती 1190 ईस्वी में आए और सबसे पहले लाहौर में आए।
यह लाहौर दिल्ली होते हुए अजमेर पहुंचे जहां पर उन्हें बाबर निकालने के लिए रामदेव और जयपाल जोगी ने प्रयास किया।
लेकिन दोनों इस्लाम धर्म के अनुयाई बन गए ख्वाजा ने यहां पर अनेक फिश बनाने का काम किया।
जिनमें ख्वाजा बख्तियार काकी हमीद नागौरी प्रमुख कुतुबुद्दीन बख्तियार की उपाधि से विभूषित किया था जिसका शाब्दिक अर्थ होता है सौभाग्यशाली।
बख्तियार काकी को दिल्ली में धर्म प्रचार करने के लिए भेजा गया दिल्ली की जनता ने काकी नाम से संबोधित किया जिसका का मतलब रोटी वाला।
कुतुबुद्दीन ऐबक का बहुत आदर करता था और इनके 36 में इनके द्वारा कुतुब मीनार का निर्माण करवाया था।
सुल्तान इल्तुतमिश बख्तियार काकी का आदर करता था इन्हें राज्य के शेख उल इस्लाम के पद पर बैठा ना चाहता था।
लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया जिसके कारण शेख नजमुद्दीन सुभ्रा को बैठाया गया बख्तियार काकी के प्रमुख शिष्य शेख परी उद्दीन गंज शकर बाबा फरीद के नाम से जाना जाता था।
बाबा फरीद का जन्म मुल्तान में हुआ था इन्हें न्यू जनता बहुत अधिक प्रिय थी इसलिए इन्होंने सुनसान जगह पर अपना आवाज बनाया।
उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि कभी सुल्तानों और अमीरों से मित्रता ना करना और कभी उनके निवास स्थान पर ना जाना।
जो भी सूफी संत अमीरो हुआ सुल्तानों से मित्रता करेगा उसका अंत खराब होगा भी बाबा फरीद का बहुत आदर करता था।
बाबा फरीद के भक्ति भजन सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है बाबा फरीद की मृत्यु 1265 में हूं इन्हें पंजाब में पंजाब में हुआ।