गुलाम भारत के बारे में स्वाधीनता के बाद नेहरू जी के कुछ शब्द

   इस काल के बारे में नेहरू जी ने बाद में लिखा है- "कि भय और तृष्णा ने हमारे मन को घेर लिया था और सभ्यता के सर्व बंधन टूट चुके थे। एक दरिंदगी के बाद दूसरी दरिंदगी देखने मे आइ औए मानव शरीरधारी प्राणियो की निर्मम पशुता को देखकर हृदय एकाएक शून्य से भर उठा । चिराग एक-एक करके बुझते नजर आ रहे थे। लेकिन सभी नहीं, क्योंकि एक दो अभी भी उमड़ते तूफान में टिमटिमा रहे थे। हम मरने वालों और मर रहे लोगों के प्रति और मौत से भी अधिक भयानक दौड़ उठा रहे लोगों के प्रति दुखी थे। इससे भी अधिक दुःखी थे हम भारत अपनी साझी माता के प्रति जिसकी मुक्ति के लिए हम इतने वर्षों से प्रयास कर रहे थे।"

    "इससे पहले 1947 में अपने जन्मदिन पर एक पत्रकार के प्रश्नों का उत्तर देते हुए गाँधीजी ने कहा था कि वे अब और जीना नहीं चाहते और वे ईस्वर से प्रार्थना करेंगे कि वह मुझे आँसुओ की घाटी से उठा ले और मुझे हत्याकांड का असहाय दर्शक न बना रहने दे जो बर्बर बन चुका मनुष्य कर रहा है, भले वो अपने आपको हिन्दू या मुुुसलमान या फिर कुछ और कुछ ही क्यों न कहता हो।"

   लेकिन स्वाधीनता के संघर्स ने औपनिवेशिक शासन को ही नही उखाड़ फेंका था, इसकी एक तस्वीर भी सामने रखी थी, यह तस्वीर एक लोकतांत्रिक नागरिक स्वतन्त्रताओं से भरपूर और धर्मनिरपेक्ष भारत की थी।यह तस्वीर एक स्वाधीन आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, सामाजिक और आर्थिक समानता और राजनीतिक रुप  जागरूक और सक्रिय जनता पर आधारित भारत की थी।

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