मेरठ षड्यंत्र केस (1929-33)

मेरठ षड्यंत्र कांड मुकदमा ब्रिटिश शासन के दौरान चली सर्वाधिक कुख्यात मुकदमों में से एक है। कुल 32 कम्युनिस्ट इस षड्यंत्र में शामिल थे। एम.एन.रॉय तथा ब्रिटिश नागरिक हचिन्सन को छोड़कर बाकी सभी को मार्च 1929 में ही गिरफ्तार कर लिया गया था।                   

             गिरफ्तार किए गए कम्युनिस्टों में तीन ब्रिटिश नागरिक भी थे- फिलिप्स स्प्रीट, बेन ब्रेडले तथा लेस्टर हचिंसन। इन पर इस बात का आरोप था कि वे सर्वहारा वर्ग के किसानों मजदूरों की सत्ता को उखाड़ फेंकना चाहते थे। इस गिरफ्तारी की जबरदस्त आलोचना  की गई। गांधी जी ने इसकी व्याख्या कानून के भेष में अराजकता की राशि के रूप में की और कहा कि इसका उद्देश्य कम्युनिस्ट को समाप्त करना नहीं आतंक फैलाना है। "मेरठ षड्यंत्र में फंसे अभियुक्तों को बचाने के लिए राष्ट्रवादी नेता जवाहरलाल नेहरू, एम ए अंसारी, कैलाश नाथ काटजू, एम सी छागला आदि ने पैरवी की।

          यह मुकदमा 1929 से  1933 तक चलता रहा और 16 जनवरी 1933 को इन अभियुक्तों को  कड़ी से कड़ी सजा सुनाई गई ।

1930 के दशक में इस तरह से मजदूर आंदोलन का यदि तीव्र उत्थान हुआ, तो उसके दमन की भी तीव्र कोशिशें ब्रिटिश सरकार के द्वारा की गई। उत्थान व पतन के इस द्वंद में अंततः कुछ वर्षों के लिए  कम्युनिस्ट आंदोलन निष्क्रिय रहा।इसकी तीव्रता में कमी आने के कुछ और भी कारण थे - 

  1.  कम्युनिस्ट पार्टी ने कुछ आत्मघाती नीतिगत भूल की। उसने छठी कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के परामर्श पर कांग्रेस से अपना नाता तोड़ लिया और कांग्रेस को ' पूजी पतियों की पार्टी व दलाल' कहा गया। अहिंसक संघर्ष के बजाय इन लोगों ने हिंसक व सशक्त विद्रोह का नारा दिया।
  2. इतना ही नहीं उन्होंने श्रमिक कृषक पार्टी को भी यह कहकर भंग कर दिया कि येे दो वर्गों की पार्टी है, इसलिए यहाँ बुर्जुआ प्रभाव के घुसपैठ की गुंजाइश है।
  3. कांग्रेस के नेतृत्व में चलने वाले सविनय अवज्ञा आंदोलन से अलग रहकर राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य रूप से काफी मजदूरों ने भी इस आंदोलन में हिस्सा लिया। इस आंदोलन के दौरान मुंबई में कांग्रेस ने नारा दिया मजदूर व किसान कांग्रेस के हाथ पांव है ।
  4. 1929 विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का भी इन कम्युनिस्टों के आंदोलन पर गहरा प्रभाव डाला ।
  5.  भारत में मंदी 1936 तक जारी रही सैकड़ों फैक्ट्रियां बंद हो गई व हजारों श्रमिक रोजगार से हाथ धो बैठे। श्रमिक यूनियनों की संख्या में भी भारी कमी आई।
  6. कमजोर होने का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण था- एटक का विभाजन
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