स्वराज्य के लिए संघर्ष और कानून सुधार

     राष्ट्रीय आन्दोलन का तीसरा और अंतिम चरण 1919में शुरू हुआ जब विशाल जन-आन्दोलन का युग आरम्भ हुआ। इस काल मे भरतीय जनता ने संभवतः विश्व इतिहास के सबसे बड़े जान संघर्ष लड़े और भारत की राष्ट्रीय क्रांति विजयी हुई। अंतरास्ट्रीय स्थिति भी राष्ट्रवाद के पुनरोदय के अनुकूल थी। महायुद्ध का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह भी हुआ कि गोरों की प्रतिष्ठा घटी रूसी क्रांति के प्रभाव से भी राष्ट्रय आंदोलनों को बहुत बल मिला। रूस में व्लादिमीर इलीच लेनिन के नेतृत्व में वहां की बोल्शेविक पार्टी ने जार का 7 नवंबर 1917 में तख्ता पलट दिया। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय आह्वानों, उत्तेजनाओं एवं प्रयत्नों से प्रेरित, भारतीय राजनैतिक संगठनों द्वारा संचालित अहिंसावादी और सैन्यवादी आन्दोलन था, जिनका एक समान उद्देश्य, अंग्रेजी शासन को भारतीय उपमहाद्वीप से जड़ से उखाड़ फेंकना था।

     भारत की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन दो प्रकार का था एक अहिंसक आन्दोलन एवं दूसरा सशस्त्र क्रान्तिकारी आन्दोलन। भारत की आज़ादी के लिए 1757 से 1947 के बीच जितने भी प्रयत्न हुए, उनमें स्वतंत्रता का सपना संजोये क्रान्तिकारियों और शहीदों की उपस्थित सबसे अधिक प्रेरणादायी सिद्ध हुई। वस्तुतः भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है। भारत (यतीन्द्रनाथ मुखर्जी)की धरती के जितनी भक्ति और मातृ-भावना उस युग में थी, उतनी कभी नहीं रही। मातृभूमि की सेवा और उसके लिए मर-मिटने की जो भावना उस समय थी, आज उसका नितांत अभाव हो गया है।

      ब्रिटिश सरकार ने भारत मंत्री एडविन मांटेग्यू तथा लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने 1918 में संबिधान सुधारों की एक योजना रखी जिनके आधार पर 1919 का भारत सरकार कानून बनाया गया । इस कानून में प्रांतीय विधायी परिषदों का आकार बढ़ा दिया गया तथा निश्चित किया गया कि उनके अधिकांश सदस्य चुनाव जीत कर आएंगे ।

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